28 जून

आत्मबोध

“भैय्या, थोड़े फूल खरीद लीजिए।”

मैंने मुड़कर देखा, एक छोटी सी बच्ची अपने हाथों में चमेली के फूल लिए आशा भरी आँखों से मेरी तरफ देख रही थी।

“पर मैंने तो फूल खरीद लिए हैं,” मैंने कहा।

“थोड़े से और खरीद लीजिए न भैय्या, आज सुबह से बोहनी नहीं हुई है।”

“आखिर आज आप भगवन के दर्शन करेंगे,” उस बच्ची ने मुस्कुरा के कहा।

“अच्छा, फिर थोड़े फूल दे दो।”

बच्ची ने फूलों को अख़बार के पन्ने में सफाई से लपेट कर मुझे दे दिया।

मैंने 10 रुपये का नोट उसके हाथों में थमाया।

“धन्यवाद, भैय्या।”

पूजा के बाद मैं मंदिर के प्रांगण में कुछ देर बैठा।

सुबह की तेज धूप में कुछ बेचैनी का आभास हो रहा था। जैसे ही मैं वापस जाने के लिए तैयार हुआ, एक भजन की आवाज़ सुनकर मैं थम गया।

एक वृद्ध माली प्रभु की महिमा में गीत गाते हुए मंदिर के बगीचे में फूलों की देख-रेख कर रहा था। उसका प्रसन्नचित्त चेहरा मानो उसके हृदय में हर्ष को प्रतिबिम्बित कर रहा हो।

“क्या आपको थकान नहीं होती?” मैंने उस माली से पूछा।

“मंदिर में इन फूलों का ध्यान रखना तो ईश्वर की सेवा है, इसमें थकन कैसी?” माली ने अपने माथे से पसीने को पोंछते हुए कहा।

“क्या थोड़ा पीने के लिए पानी मिलेगा?” मैंने आग्रह किया।

माली ने एक बूढी महिला की ओर संकेत किया जो अपने चेहरे पर मुस्कान लिए मंदिर के द्वार पर आगन्तुकों को सुराही से जल पिला रही थी।

मैंने मंदिर के परिसर का निरीक्षण किया। फूलों पे मंडराती तितलियाँ, पक्षियों का चहचहाना, और बगीचे के कोने पे आम का वृक्ष।

उस क्षण में एक आत्मबोध हुआ। क्या ईश्वर मेरे साथ हर पल नहीं था? उस वृद्ध माली के ह्रदय के हर्ष में, बूढी महिला की स्वार्थरहिथ सेवा में, फूलों में, पेड़ों में, ईश्वर की हर सृष्टि में? बस मैंने इस दृष्टिकोण से कभी सोचा नहीं था।

“क्या आपने भगवान को देखा?” फूल वाली बच्ची ने पूछा।

“हाँ, देखा,” मैंने मुस्कुराकर कहा।

मैंने प्रसाद मैं मिले लड्डू उस बच्ची को दिये।

और उसके चेहरे की मुस्कराहट में फिर एक बार ईश्वर को देखा।

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4 thoughts on “आत्मबोध

  1. इतने दिनों के बाद शुद्ध हिंदी पढ़के हृदय प्रसन्नता से भर गया। दिल को छू जाने वाली एक लघु कथा सुनने का आनंद हुआ एवं ईश्वर को एक नए रूप में देखने का अवसर मिला।

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