01 मई

गाय पर निबंध

बचपन में खूब सोचा करते थे कि कभी यह कारनामा भी कर दिखाएँगे, जीती-जागती गाय पर निबंध लिख कर भाग आएँगे। पर क्या कहें, कभी इतनी हिम्मत ही नहीं जुटा पाए, तो गाय तो कभी मिली नहीं। हैसियत के अनुरूप बकरी के ऊपर निबंध जरूर लिखा, और खूब वाहवाही भी बटोरी। और क्यों न हो, आख़िर हमारे राष्ट्रपिता गाँधी बकरी का दूध पीकर ही तो इतने प्रसिद्ध हुए थे। मन ही मन आंदोलन छेड़ने की ठान ली, कि स्वतंत्र भारत के सभी विद्यालयों में गाय की जगह बकरी पर निबंध को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। बकरी पर निबंध स्वाभाविक है कि छोटा भी होगा, उसे अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए इतने शब्दों में फैलना नहीं पड़ेगा। पर माँ तो माँ होती है न। कभी किसी को कहते सुना है ‘बकरी माँ’? कोई कभी अपनी माँ को बकरी दिखाते हुए यह भी न कहे कि ‘क्या बकरी है, माँ!’ भले ही वहाँ से उस समय कितनी ही उत्कृष्ट बकरी क्यों न गुज़र रही हो।

शिष्टाचार एवं बड़ों का आदर करना हमारे खून में है। ठीक उसी तरह जैसे चोरी, बेईमानी, और झूठ बोलना हमारे खून में है। भारत के रक्त में यह सभी कण आपसी सौहार्द एवं प्रेम के साथ रहते हैं। और इन सबको जोड़ के रखने का काम मुनाफ़ा करता है, शुद्ध लाभ। वैसे यह कहना आवश्यक नहीं, क्योंकि लाभ कभी अशुद्ध हो ही नहीं सकता, यह तो सब जानते हैं, और अशुभ भी नहीं हो सकता। साक्षात् लक्ष्मी माता को अशुभ कहने की उद्दंडता कौन कर सकता है? मुनाफ़ा सूँघ लेने की हमारी शक्ति भी अनेक कल्पों, युगों, जन्मों से विकसित होती आ रही है। और इसी आंतरिक शक्ति ने, जो कि हमारे रक्त में प्रवाहित हो रही है, हमें यह सिखाया है कि निबंध लिखना है तो गाय पर लिखो, बकरी पर निबंध लिखोगे, तो राह चलते लोग यही कहेंगे कि अमां क्या बक रिया है। तो आइए, प्रारम्भ करते हैं।

गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है। यह प्राथमिक विद्यालयों में उत्पन्न लोकोक्ति आज विजय के मूल मन्त्र का रूप ले चुकी है। जिसने इसे सिद्ध कर लिया, समझिए उसे कोई नहीं हरा सकता। गौ माता भेदभाव नहीं करतीं, आप उनकी प्रशंसा और भक्ति करें या अवमानना, माता सभी बच्चों को समान अवसर एवं फल प्रदान करती हैं। पूर्व वैदिक काल में तो पूरी अर्थव्यवस्था ही गौ माता पर आधारित थी। जिसके पास जितना गोधन, वह उतना सुखी। उत्तर वैदिक काल में कृष्ण गौ माता की आराधना करके स्वयं ईश्वर पद को प्राप्त हुए। महर्षि वशिष्ठ से कामधेनु बलपूर्वक भी न ले पाने पर विश्वामित्र का मोहभंग हो गया और उन्हें वैराग्य की प्राप्ति हुई, फिर वे महान राजर्षि विश्वामित्र के रूप में प्रसिद्ध हुए। बताया तो, आप गौ माता के पक्ष में हैं या उनके विरुद्ध, इस से गौ माता को कोई फर्क नहीं पड़ता। समान फल की प्राप्ति होगी।

बस यह कलियुग ही है जहाँ हमें गौ माता की उपेक्षा देखने को मिलती है। सडकों पर बैठीं कचरा खाती हमारी गौ माता को देख कर हमारे अंदर की मानवता के कान पर जूँ भी नहीं रेंगती। यह भी हमारे खून में है – फ़र्क नहीं पड़ना। यह विधा इतनी आसानी से विकसित नहीं होती। साधारण मनुष्य ऐसा कर पाने में असमर्थ होता है। दूसरे देश वालों को देखेंगे तो पाएँगे कि उनके संस्कारों में यह है ही नहीं। यह भारत की अमूल्य विरासत है, निधि है। हमारे पूर्वजों ने कई जन्मों की तपस्या के बाद इसे प्राप्त किया था। हमें फ़र्क नहीं पड़ता, किसी भी बात से। धन्य है यह भारत भूमि जिसे हम जैसी निकम्मी संतान का सुख प्राप्त हुआ। ध्यान की ऐसी पराकाष्ठा इंटरनेट और टीवी पर योग को योगा बता कर बेचने वालों के स्वप्न के भी परे है। यह तो समाधि स्तर की बात है। फ़र्क नहीं पड़ता है। गौ माता को गौ माता कह दिया और हो गया काम। बाकी माता अपना खुद देख ही लेंगी। न्यायालय बीच-बीच में गौ माता के विश्राम में विघ्न डालते पाए जाते हैं, गौ माता उन्हें भी कुछ नहीं कहतीं।

राजनीति में गौ माता का विशेष महत्त्व है। त्रेतायुग में कामधेनु बस एक थी, और आज देखिए, हर गईया कामधेनु है। गौ माता राजनीति का वह टिकट हैं जो आसानी से उपलब्ध है। भारतीय समाज का वह हिस्सा जो आज भी अपने को सनातन धर्म का अनुरागी बताता है, अपनी ग्लानि को गौ माता के नाम पर राजनीति से शांत करने का भरसक प्रयास करता है। संस्कृति एवं संस्कारों की रक्षा होनी ही चाहिए, और हमें अभी बहुत लम्बा सफ़र तय करना है। पहले गौ माता को सडकों से उठा कर गौशालाओं तक पहुँचाना आवश्यक है। समाज में जनधारणा बनाना आवश्यक है। पर प्रश्न यह उठता है कि ऐसा करे कौन? यह भी हमारे खून में है। आशा करना कि कोई दूसरा आकर हमारे काम कर दे। हमने धर्म की रक्षा का ठेका धर्म की राजनीति करने वालों को दे दिया है। गौ माता को बचाने का कितना लोगे? बस धरना-प्रदर्शन करेंगे, थोड़ी हिंसा होगी, यह सब तो स्टैंडर्ड सर्विस पैकेज का हिस्सा है, संसद में कानून लाने का अलग से मूल्य लगेगा।

जिनको गाय बचानी है और जिनको गाय खानी है, उनके बीच का यह सांस्कृतिक द्वंद्व राजनैतिक दृष्टिकोण से बहुत लाभदायक है। हमारी लाभ सूँघ लेने वाली शक्ति को याद कीजिए। और फ़ायदा दोनों पक्षों का होता है, इसे कहते हैं ‘विन विन सिचुएशन’। जिसे गाय खानी हो खाए, जिसे गाय बचानी हो बचाए, हमें तो भैया बस गौ माता की पीठ पर बैठ कर लोकसभा तक जाना है।