01 मई

चुनाव विशेषांक: लोकतंत्र महोत्सव

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकसभा-चुनाव के पावन पर्व पर आप सभी को शुभकामनाएँ!

लोकतंत्र में कितनी ही खामियाँ क्यों न हों, पर अभी तक मानव के द्वारा गढ़ी हुई यह शासन की सबसे अच्छी प्रणाली है। भारत जैसे विशाल, विविधताओं से भरे, जन-बाहुल्य देश में भी सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण 70 सालों से होता आ रहा है, यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। स्वतंत्र भारत की अब तक की कथा में एकमात्र अपवाद इंदिरा गाँधी के द्वारा 21 महीनों के लिए लागू आपातकाल का काला अध्याय ही है। आजादी के समय पता नहीं कितनों को भारत में लोकतंत्र के ऐसे सफल होने की संभावना दिखी होगी। लेकिन भारत के संविधान और संस्थान निर्माताओं ने जो नींव डाली थी, वह वाकई बहुत मजबूत है।

हमारे गणतंत्र में दो मंत्र निहित हैं। पहला, भारत एक गणराज्य है, यानी विभिन्न राज्यों से मिलकर बना है, प्रत्येक राज्य उसकी एक महत्वपूर्ण इकाई है। दूसरा, इन सारे राज्यों की माला हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ संवैधानिक लोकतंत्र के सूत्र में भी पिरोई हुई है। इन चुनावों में, इस मतों के बंटवारे के उन्माद में हम यह बात न भूलें, इसी में हमारी भलाई है।

आज से करीब 2,500 साल पहले वैशाली विश्व का पहला गणराज्य था जो अष्ट-कुल के नाम से जाना जाता था क्योंकि इसमें आठ महाजनपद (कह लीजिए कि उस समय के राज्य) शामिल थे। शक्ति में यह मगध के समकक्ष था, और इसके एक राज्य लिच्छिवी का राजा लोगों द्वारा चुना जाता था! राजा भरत की अर्वाचीन परम्परा में भी सत्ता का पिता से पुत्र को स्वत: हस्तांतरण नहीं होता था, योग्यता राजा बनने की अनिवार्य शर्त थी। तो हमारा गणतंत्र आधुनिक भले ही हो, पर जान-पहचान बहुत पुरानी है।

साथ ही राजनीति से भी जान-पहचान बहुत पुरानी है। राजधर्म और नीति से लेकर कूटनीति और राजनीति तक न केवल शब्द बदले, बल्कि शब्दों के मायने भी बदलते रहे हैं। आज राजनीति को बहुत आदर की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। जब राजनीति सत्ता-शक्ति या सम्पन्नता की सीढ़ी ज्यादा हो और समाज की उन्नति का माध्यम कम, तो इस अनादर पर आश्चर्य कैसा?

राजनितिक संवाद की आज की स्थिति पर क्या कहा जाए? किसी भी टी.वी. चैनल के प्राइम टाइम पर होने वाली बहस ज्यादातर तू-तू-मैं-मैं और चीखना-चिल्लाना ही होती है। केवल इस चुनाव में ही नहीं, शायद चुनावी संवाद का स्तर हमेशा ही समाज की अपेक्षा से नीचे रहा है। मैं बहुत छोटा था, कक्षा एक में पढ़ता था, लेकिन मुझे 1980 के लोकसभा चुनाव में मेरे मोहल्ले में रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगाकर टेप-रिकॉर्डर पर चुनाव-प्रचार के लिए बजते गाने की आरंभिक पंक्तियाँ अभी भी याद हैं :- “जगजीवन जीवन भर रुइहैं, बहुगुणा गुणा-भाग करत रहिहैं।” अब आप ही बताइए कि इसमें किस मुद्दे की गहरी चर्चा निहित है। आज फर्क सिर्फ इतना है कि मीडिया और सोशल-मीडिया के रिक्शे पर रखे लाउडस्पीकर सबकी उँगलियों पर उपलब्ध हैं। सब अपना राग अलाप रहे हैं, लेकिन स्तर शायद बहुत ज्यादा नहीं बदला है।

आज राजनीति सामाजिक सरोकारों से परे भले ही लगती हो, लेकिन उसका समाज पर गहरा असर पड़ता है, इसलिए साहित्य न तो राजनीति से उदासीन रह सकता है, और न ही राजनीति की तरह उथला और सतही। हिन्दी साहित्य में राजनीतिक आलोचना की समृद्ध परम्परा है। चाहे वो दिनकर की नेहरू की चीन युद्ध-नीति पर रोष भरा गीत हो, बाबा नागार्जुन के नेहरू और इंदिरा गाँधी पर चुभती कविताएँ हों, दुष्यंत की ललकारती ग़ज़लें हों, या परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, ज्ञान चतुर्वेदी के नुकीले व्यंग्य बाण, हिन्दी साहित्यकारों ने अपने दायित्वों का निर्वाह हमेशा किया है।

सृजन के इस अंक में हम इसी दायित्व को निभा रहे हैं। हम सामायिक, राजनितिक, सामाजिक, ज्वलंत, और विवादस्पद मुद्दों से मुँह नहीं फेरेंगे। लेकिन साथ ही थोथी राजनीति भर नहीं लिखेंगे, बल्कि हमेशा विमर्श की साहित्यिक कसौटी पर खरा उतरने के लिए प्रयासरत रहेंगे। विचार और भावनाएँ सलीके से अभिव्यक्त की जाएँगी, पक्ष-विपक्ष रखने के लिए, एक-दूसरे को समझने के लिए, तर्क-कुतर्क या जीत-हार के लिए नहीं। हम विसंगतियों और विडम्बनाओं पर चोट करने से पीछे नहीं हटेंगे। और यह चोटें तीखी होंगी, करारी होंगी, लेकिन उसके मूल में अंध-विरोध नहीं होगा, केवल हमारे प्रजातंत्र की उन्नति की भावना होगी।

इस अंक में हम अतीत के कुछ दिग्गजों की चुनी हुई कालजयी रचनाओं को भी लाये हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं और प्रेरणास्रोत भी।

इस सब को समेटे सृजन का चुनाव-विशेषांक आपके सामने है। आपको हमारा प्रयास कैसा लगा यह आप कमेंट करके हमें जरूर बतलाइए।

सहयोग और सहभागिता की आशा के साथ,
आपका,
सतीश चन्द्र गुप्त

अनुक्रमणिका

कालजयी रचनाएँ:

06 अप्रैल

पुण्य सँजो कई जन्मों का

पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ
अब झेलो मुझको, मैं तुम सबके पाप गिनाने आया हूँ

चाहा तो तुमने भी होगा कि मुझसे रिश्ता टूट सके
राह बदल कर, चाल बदल कर, मुझसे पीछा छूट सके
पर भाग्य ठगे न केवल मुझको, तुम भी उससे हारे हो
घूम-फिरे तुम दुनिया भर पर फिर भी साथ हमारे हो
बचा रह गया, भूला-बिसरा उधार चुकाने आया हूँ
पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ

अब साथ चल रहे मेरे तुम जो, थोड़ा ये उपकार करो
झेल रहे हो मुझको कब से, तो इतना और यार करो
लेन-देन का ये खाता, भई इसको यों ही चलने दो
हिसाब बराबर न हो देखो, कुछ तो बाकी रहने दो
समझो यों अगले जन्मों का व्यापार बढ़ाने आया हूँ
पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ

06 अप्रैल

ग्रीष्म-अंक: ‘सृजन’ का नॉस्टाल्जिआपा

‘सृजन’ के इस नए रूप का प्रथम अंक आप सभी को सविनय प्रस्तुत है। इसकी भूमिका लिखने का प्रयास पिछले दिनों में कई बार किया, परन्तु स्वयं को नितांत अक्षम पाया। भावों के कई तंतु हैं, बहुत सोचा कि कैसे उनकी एक डोर बनाकर आपको उसमें लपेट लूँ, कैसे शुरुआत करूँ, लेकिन कुछ भी जँचा नहीं, हर प्रयास में एक अधूरापन सा लगा। फिर स्मरण आया कि मौन भी एक अभिव्यक्ति है, और न कह पाने की यह स्वीकारोक्ति भी एक कथन है। न कह पाना केवल मेरा ही अनुभव नहीं है, आपके साथ भी कभी न कभी हुआ ही होगा। तो उम्मीद है कि आप समझ जाएँगे।

आई. आई. टी. कानपुर में बी. टेक. की पढ़ाई के प्रथम वर्ष में ‘सृजन’ नाम की हिन्दी मासिक भित्ति-पत्रिका से परिचय हुआ। कई छात्रों की तरह मैं भी बारहवीं कक्षा तक हिंदी माध्यम में पढ़ा था; विज्ञान और गणित, सब कुछ हिन्दी में। अभी भी गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान के कई तकनीकी शब्द मेरे दिमाग में पहले हिन्दी में आते है। अब जब मैं वहाँ पुस्तकालय में बिताए अपने सीमित समय को याद करता हूँ, तो पाता हूँ कि वह अधिकांश हिन्दी पुस्तकों की अलमारियों के बीच गुजरा। हिन्दी की जितनी कहानियाँ, उपन्यास, कविताएँ उन चार सालों में पढ़ीं, उतनी न उसके पहले पढ़ीं और न बाद में। पढ़ाई-लिखाई, मस्ती और बदमाशी के बीच पुस्तकालय के सूचना-पट पर लगे ‘सृजन’ के पन्नों को पढ़ना पसंदीदा शगल हो गया। हर महीने इंतज़ार रहता था। आखिर आत्मा मातृभाषा में ही बोलती-समझती है।

दूसरे वर्ष में ‘सृजन’ प्रकाशन की जिम्मेदारी अश्विनी ने ले ली, मैं और कई अन्य मित्र इसमें सहयोगी थे। सहपाठियों से रचनाएँ इकट्ठा करते थे, कागज पर अपने सुन्दर हस्तलेख से लिखते थे, और पुस्तकालय के सूचना पटल पर लगाते थे। कुछ अपरिहार्य कारणों से अंतिम वर्ष में यह पत्रिका बंद हो गयी। हम सभी अपने जीवन के अगले पड़ाव की तैयारी में व्यस्त हो गए। जब आई. आई. टी. से निकले तो हम सब अपनी जिंदगी में डूब गए। पहले अपने काम और आजीविका की सरपट दौड़, और फिर साथ में विवाह और बच्चों की जिम्मेदारियाँ। वक्त की कैद में सभी की जिंदगी है, मगर जो चंद आजाद घड़ियाँ मिलीं बस उनमें ही हिन्दी साहित्य को पढ़ना या लिखना हो पाया।

इस सब के बीच ‘सृजन’ की स्मृति पता नहीं कैसे जीवित रही। ठीक चार हफ्ते पहले हम ‘सृजन’ के चाहने वालों के बीच यह बात चली कि सृजन को फिर से शुरू करना चाहिए। अश्विनी ने कहा कि चैत्र प्रतिपदा पर नव संवत्सर के शुभ अवसर पर ‘सृजन’ का पुनस्र्त्थान हो, प्रथम अंक निकले। समय बहुत कम था, और साथ ही वित्तीय वर्ष का आखिरी मास भी था, लेकिन फिर भी “शुभस्य शीघ्रम्” और “काल करे सो आज कर” के भाव से लग गए। पहला कदम चाहे जितना ही छोटा क्यों न हो, यात्रा का शुभारम्भ उसी से होता है। पिछले चौबीस सालों में बहुत कुछ बदल गया है। इंटरनेट और यूनिकोड ने हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के साहित्य को सुलभ कराया है, और प्रकाशन सरल हुआ है, और तकनीकी ने पाठकों तक पहुँचना सुगम कर दिया है। लेकिन साथ ही, हम सभी को लिखने का उतना अभ्यास नहीं रहा है, और सभी काफी व्यस्त भी हैं। इस सब के बावजूद, प्रस्तावित समय-सीमा में हम आरंभिक अंक निकालने में सफल हुए हैं।

भविष्य में यह पत्रिका किस मुकाम पर पहुँचेगी, वृक्ष कैसा होगा, कौन से फूल-फल लगेंगे, यह हमारा प्रयास निर्धारित करेगा। लेकिन इसका बीज कहाँ से आया, यह इस अंक की विषयवस्तु है। यह अंक अतीत और आगत के बीच की कड़ी है, इसीलिए हमने इसे नॉस्टाल्जिआपा कहा है।

आशा है आपको हमारा प्रयास पसंद आएगा, और आप इसके प्रकाशन और प्रसार में सहयोगी होंगे।

प्रोत्साहन एवं सहभागिता की आशा के साथ,
आपका,
सतीश चन्द्र गुप्त
चैत्र प्रतिपदा, संवत 2076
(6 अप्रैल 2019)

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