06 अप्रैल

बकैती से बिजनेस तक

“अबे पंडित, आज ये गज़ब कैसे भाई, हैलेट भिजवाने का जुगाड़ है क्या? संडे को नहा धो के सुबह सुबह होस्टल की मेस में?” B-Mid के तेलू गैंग के लड़के सकते में। क्यों? आते हैं, धैर्य रखें।

पंडित माने IITK हॉल 2 के बकैत श्रीमान सौरभ अवस्थी, बाप का करोड़ों का बिज़नस, डील डौल से फिल्मी कदकाठी के मालिक और किस्मत न जाने किस नक्षत्र में लिखा के लाए हैं कि भाई साहब चाहे लेक्चर जाएँ न जाएँ, किसी को exam के लिए कभी exam वाली पढ़ाई तो करते दिखे नही लेकिन जब exam के रिजल्ट आएँ तो भाईसाहब की जेब मे दस के पूरे दस – चाँपू, दस्सू या फोड़ू जो भी कह लें। अब ये कहाँ का न्याय हुआ? भगवान कृष्ण गीता में अर्जुन को बड़े लंबे से समझाये की कर्म में विश्वास रखो, फल की चिंता न करो। अब जब बैच में पंडित जैसे प्राणी बिना मेहनत किये दस्से का रायता फैलाने के लिए अवतरित हो जाएँ तो लोग काहे फल की चिंता न करें। इतिहास गवाह है कि जब जब गीता के जज्बाती खयालों में बह के तेलू गैंग के नादान अर्जुनों ने फल की चिंता छोड़ी है, तब तब कांड हुआ है, और ऐसा वैसा कांड नहीं, इतना दर्दनाक (वैचारिक स्वतंत्रता में इसे शर्मनाक भी कहा जा सकता है) कि इसकी गूंज दो बैच नीचे और दो बैच ऊपर तक सुनाई दी है। ख़ैर, IIT में रोन्दुओं की कोई जगह नही, रोना IITian के सम्मान के ख़िलाफ़ है। इस मामले में तेलू-चाँपू एक समान, पूरी बिरादरी एक। इसीलिए मिड-सेम और एन्ड-सेम के ठीक पहले वाली रात तेलू और चाँपू एक ही कमरे में समभाव के अद्भुत उदाहरण रूप में देखे जा सकते हैं, जैसे शेर और हिरण नदी के एक ही किनारे पर एक साथ पानी पी रहे हों।

जाहिर है जिस बंदे के बिना पढ़े दस्से लग रहे हों और IITK की ज़िंदगी का कोई ऐसा कोना बाकी नही जिसमे उसकी शिरकत न हो तो ऐसे बंदे की ज़िंदगी से कोई क्यों न जले और वो भी सुलग-सुलग के, रोज including weekends। पंडित के बड़े जलवे हैं IITK में इसमे कोई दो राय नही। और इन जलवों का एक पहलू है GH में पंडित की गहरी पैठ। जिसे अपनी खुद की मदद करने से फुरसत मिली रहती है वो अक्सर philanthropist बन जाया करते हैं। अब आप यूँ समझो कि एक तरफ सभ्यता, सौम्यता एवं शिष्टता का कटोरा लिए पुरुषवर्ग की जनता GH के आसपास प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में लोटती रहे और ये महाराज अपने ज्ञान की बकैती रोज सुबह शाम GH में मुफ्त बाँटते पाए जाएँ| जहाँ फूटी किस्मत के मारे साधारण होस्टल निवासी GH के single entry visitor visa से धन्य हो जाते, वहीं सौरभ अवस्थी को GH का greencard मिला हुआ था। वैसे जब सौरभ अवस्थी नए नए IITK में प्रवेश किये तो खूब अफवाह फैली कि इनके IIT में चयन होने पर मिस इंडिया की बधाई का फ़ोन आया था। जनसाधारण में ऐसी मान्यता है कि मिस इंडिया इनकी मम्मी की साइड में किसी रिश्तेदारी में आती हैं। ख़ैर ये सब सुनी-सुनाई मौज लेने वाली चुस्कियाँ हैं, IITK में इन बातों का बड़ा महत्व है और ऐसी बातों को पूरी इज़्ज़त से सामान्य ज्ञान का दर्जा प्राप्त है। वर्ना क्या जरूरत थी पंडित के बारे में बात करते करते ऐसी gossip में उतरने की।

पंडित के जलवे रखें एक तरफ, एक बात जो सब मानते हैं की पंडित का दिल बड़ा साफ है। जो मन मे है वो जुबाँ पर और जो जुबाँ पर वह ही यथार्थ में जिंदगी के action में फिर चाहे कोई कुछ भी सोंचे और कुछ भी कहे। पंडित को lesser mortals की खिट-पिट और खिचिर-पिचिर में कोई रुचि नही। उसे ज़िन्दगी को अनुभव करना आता है। उसे खुश रहना आता है। पंडित का कोई दुश्मन नही। हालाँकि सिर्फ एक बात में पंडित का हाथ तंग है और वो है अंग्रेजी बोलने में। लेकिन लिख-पढ़ पाने और समझने में कोई कमी नही। IITK प्रवेश के समय की बात और थी लेकिन अब जब GH में झंडा गड़ा हो और exam में भर भर के दस्से आ रहे हों तो अंग्रेजी बोलना न बोलना पंडित के लिए IIT की ज़िंदगी मे कोई इत्तेफाक नही रखता।

पंडित ने IIT की first year की लाइफ को पूरी ज़िंदादिली और बकैती से जिया। कुछ नही छोड़ा, कैंटीन, सुट्टा, दारू, फुटबॉल, अन्तरागिनी, इलेक्शन, प्रोटेस्ट, डिबेट, मैग्गी, स्विमिंग पूल, फ्लाइंग क्लब, सोशल क्लब, और तो और कैंपस के अंदर बच्चों के स्कूल में पढ़ाया भी, कुछ भी नही छोड़ा।

दुनिया के लिए IIT में घुसना भले ही रुतबे के साथ लाइफ सेट होना हो, लेकिन पंडित को जीवन बीमा पालिसी की कोई जरूरत थी ही नहीं। उसका मन तो स्कूल टाइम से ही चपका था IIT कैंपस की जिंदगी में, वहाँ की आबो-हवा में कुलाँचे भरती इनटेलेक्चुअल ऊर्जा में और इन सब से भी कहीं ज्यादा दुनिया जहान के तमाम बांधों में दबी उसकी अन्तरात्मा को वैचारिक स्वतंत्रता का निर्वाण। पंडित का IIT में आने का सिर्फ एक मकसद – IIT की इस अनमोल अनुभव के हर लम्हे को जी लेना। और यही किया उसने, पिछले डेढ़ सालों में एक पूरी जिंदगी जी ली उसने।

पंडित का IIT में चौथा सेमेस्टर चल रहा है और आज IIT में उसका आखिरी दिन। किसी को इस बात का जरा भी अंदेशा नही है, B-Mid के तेलू गैंग को भी नही जिनके साथ सौरभ ने साल बिताए। पंडित आज आखिरी बार होस्टल मेस के आलू पराठों में आलू ढूँढेगा। वो होस्टल में लौटेगा, आखिरी बार अपने रूम को देखेगा और फिर उसकी जिंदगी का रास्ता एक नया मोड़ ले लेगा। कल फिर सुबह होगी, IIT के तेलू और चाँपू सब अपने तेलू धर्म और चाँपू धर्म के अनुसार अपनी कहानी आगे बढ़ाएंगे। ये IIT का एक सच है। पंडित कल से अपने पिता जी का बिज़नेस आगे बढायेगा। लोग इसकी आलोचना करेंगे, आश्चर्य करेंगे, समीक्षा करेंगे लेकिन पंडित भी इसी दुनिया का एक और सच है।

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8 thoughts on “बकैती से बिजनेस तक

    • परितोष, वैसे के पी सक्सेना जी की प्रेरणा जेहन में नहीं थी लेकिन अगर शैली मेल खाती है और पसंद आयी तो बहुत बढियाँ. अब तुमने बात उठा ही दी है तो मै मौका निकाल कर के पी सक्सेना जी की कृतियां देख लेता हूँ.

    • हितेश, पता नहीं तुम लोगों के थर्ड ईयर का अनुभव कैसा है, अब तो बहुत कुछ बदल गया है IIT में. अच्छा लगा कि तुम्हारी generation हमारे अनुभवों से relate कर पा रही है. कहानी पढ़ने के लिए तुम्हारा आभार, अगर हो सके तो अपने फेसबुक पर सृजन पत्रिका का FB पेज शेयर कर के इस पत्रिका को और लोगों तक पहुँचाने में हमारी सहायता करें. तुम्हारे बाकी के IIT के जीवन के लिए शुभाकांक्षायें, All the Best.

  1. बे को साहित्य सृजन की भाषा में शामिल करने का श्रेय काशीनाथ सिंह जैसे लेखको को जाता है। वर्तमान में यही शैली अत्यधिक प्रयोग में है जिसे एक समय साहित्य के प्रतिकूल समझा जाता था।

    लेखन बड़ा उम्दा है, बस यू लगा की थोड़ा और पढ़ने को मिल जाता

    अलकेश उत्तम
    वाई ३ बैच

    • अलकेश, मेरी रचना पढ़ने और सराहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. साहित्य में शब्दों की मर्यादा बहुत मायने रखती है और लिखते समय इसका बड़ा ध्यान रखना पड़ता है. भाषा अगर लक्ष्मण रेखा के बाहर निकल जाती है तो साहित्य साहित्य नहीं रह जाता. आज के युग में ज्यादातर लोग लम्बी रचनाये पढ़ते नहीं तो यही सोंच कर रचना छोटी ही लिखी. अगली बार थोड़ी सी और बड़ी लिखने की कोशिश करेंगे।

    • अरे जगदीश, धन्यवाद. मुझे आश्चर्य तो नहीं होना चाहिए लेकिन बड़ा अच्छा लगा शिशु मंदिर और दीन दयाल के दोस्तों की टिप्पणियां देख के. आशा तो रखता हूँ कि कोशिश जारी रहेगी, तुम लोग शुभाकांक्षा बनाये रखना

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