06 अप्रैल

बिहारी बाबू का कानपुर प्रवास

बात सन् 1991 की हैं। हम बोर्ड़ परीक्षा पास कर के पटना साइंस के हॉस्टल में विराजमान हो चुके थे। जो भी हॉस्टल में थे वो बोर्ड पास कर के इंजीनियरिंग के तैयारी में थे। तो हम भी लग गए तैयारी में। किसी मध्यवर्गी बिहारी परिवार की तरह सारी कोशिश एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज की जनरल सीट के लिए थी। वैसे भी न पैसे का शोर, न पैरवी की औकात, तो सारा जोर प्रतिभा पर (बाद में पता चला इसे ‘मग्गा’ कहते हैं)। झारखण्ड के एक आदर्श जाति-विहीन आवासीय विद्यालय के पठार से उतर कर, पटना के संकीर्ण जाति-आरक्षित हॉस्टल में रहना स्वयं में एक अनुभव था। खैर, इस पर फिर कभी फुर्सत से चर्चा की जाएगी। साल बीते, पहली बार तो न हो पाया पर दूसरी बार में पप्पू पास हो गया। और पहुँचा कॉउन्सलिंग के लिए आई. आई. टी. कानपुर।

हमारे कुछ मित्र तो पहले ही प्रयास में सौ योजन लाँघ चुके थे, कॉउन्सलिंग के समय कानपुर में ही थे। गर्मियों की छुट्टी में वहाँ क्यों थे, यह मत पूछिए – समझदार को इशारा काफी है। मेरा जो All India Rank था उसमें सिविल इंजीनियरिंग के अलावा कानपुर और दिल्ली में कुछ नहीं मिलता। हमने भी वही भरा सबसे ऊपर दाखिले के विकल्पों में। आखिरी में तीन विकल्प भरे: आई. आई. टी. कानपुर कम्प्यूटर साइंस, आई. आई. टी. दिल्ली कम्प्यूटर साइंस, आई. आई. टी. बॉम्बे कम्प्यूटर साइंस। ये बकैती भी उन्ही वहाँ गर्मी की छुट्टियाँ बिताने वाले मित्रों की देन थी।

कॉउन्सलर ने बड़े ध्यान से मेरा दाखिला फॉर्म देखा, फिर मुझे देखा, फिर से दाखिला फॉर्म देखा, और बोला, “अंतिम तीन पहले से ही भर चुके हैं, कुछ और ब्रांचों के विकल्प भर दो।” शायद उन्हें लगा कि मुझे कम्प्यूटर साइंस की रैंकिग के बारे में पता नहीं है। मैं भोला सा मुँह बनाकर बोला, “सिविल मेरी फर्स्ट चॉइस है, लेकिन अगर सिविल नहीं मिली और कम्प्यूटर साइंस मिल गयी, तो भी ले लूँगा।” कॉउन्सलर अवाक था कि अभी एडमिशन भी नहीं हुआ है और आलम ये है! उसने एक नजर मेरे वहाँ गर्मियाँ बिताने वाले दोस्तों की तरफ देखा। शायद मन ही मन में सोच रहा होगा कि अगली साल मैं भी उन्ही की तरह वहीं मिलूँगा। खैर, मैं अड़ा रहा।

कॉउन्सलिंग खत्म हुयी। मित्रों को जीत की सूचना देकर मैं अकेले ही हॉस्टल की तरफ निकल पड़ा। मन ही मन अपनी धृष्टता पर खुश हो रहा था। ये उम्र का वो दौर था जब धृष्टता का जश्न मनाया जाता था। मैं विचारों में खोया पग-पग नाप रहा था तभी सामने से आते एक छात्र ने पूछा, “gentleman, which way is L7?” आसपास कोई नहीं था, तो जाहिर था कि मुझसे ही पूछ रहा था। अभी तक ‘अबे’ की आदत थी, ‘Gentleman’ कुछ ज्यादा ही हो गया। मन में कौंधा कि क्या ये सीनियर है, और कहीं मेरी रैगिंग तो नहीं कर रहा है? मैं शुरू हो गया, “फ्रेशर, हवा एक हज़ार…।” उसने बीच में ही मेरी बात काट दी, “I am also fresher, help me navigate to L7.” मैंने इशारों से उसे L7 का रास्ता समझाया। समझ में आया कि यहाँ सिर्फ ‘medium of instructuon’ ही इंग्लिश नहीं हैं , ‘medium of communication’ भी इंग्लिश ही हैं। बड़ा डर गये हम, और डरना जायज भी था।

और फिर चार साल तक वॉट लगी रही। IIT तो JNU टाइप जगह नहीं हैं। जल्दी ही निकाल भी देते हैं। किसी तरह हम निकाल लिए। और फिर नौकरी भी ढूँढनी पड़ती हैं। हमारे टाइप के लोगों की एक ड्रीम कंपनी हुआ करती थी Infosys – न डिपार्टमेंट की पाबंदी और न ही CPI की जंजीरें। एक ‘बूझो तो जाने’ यानी कि multiple choice वाला टेस्ट लेते थे, फिर साक्षात्कार। हम भी पहुँचे। टाई लगाकर, उजला शर्ट, काला पैंट और (रूममेट का) काला जूता पहनकर। बिलकुल जेंटलमैन वाला लुक। जूता बहुत काट रहा था, हमारी आदत नहीं थी न। लम्बी कतार थी visitor hostel में। गर्मी भी कानपुर वाली। बहुत uncomfortable टाइप फील हो रहा था, पसीना ताबड़तोड़।

“Feel comfortable, चाहे तो टाई उतार सकते हैं,” अंदर घुसते ही इंटरव्यू लेने वाले बोले। “उतार तो देंगे, लेकिन फिर पहन नहीं पाएँगे,” मैंने जवाब दिया। दोस्तों ने समझाया था कि “be truthful in interview” और मैं उनकी सलाह का अक्षरश: पालन कर रहा था। स्टेट बोर्ड वाले टाई की गाँठ एक बार ही किसी से बँधवा लेते हैं, बार-बार खोलना-बाँधना उनसे नहीं होता। शायद वे भी किसी स्टेट बोर्ड के रहे होंगे, मेरी परेशानी समझ गए। बातें आगे बढ़ी।

अगला सवाल, “तुम एक हफ्ते में कितनी बार computer center जाते हो?”

“मैं आज तक सिर्फ दो बार ही गया हूँ – एक लॉगिन लेने और एक बार लौटाने।”

“Interesting! जब जाना नहीं था तो लॉगिन लिया क्यों?”

“सर, पच्चीस पेज का printout का quota होता है हर महीने का, बहुत काम आते हैं,” मैं बहुत संयम और धैर्य से जवाब दे रहा था।

“तुम्हारा CPI इतना कम क्योँ है?” वो शायद सच में जानना चाहते थे।

“सर, कम कहाँ हैं? मेरे टाइप लोगों का इतना ही होता हैं,” मैंने सच्चा जवाब दिया।

“तुम्हारी डिग्री सिविल में हैं, फिर तुम कम्प्यूटर में क्यों काम करना चाह रहे हो?”

“सर, मुझे न तो सिविल आती हैं, और न कम्प्यूटर। जो भी नौकरी मिलेगी वो सीख लूँगा।”

भला हो Infosys का, जिसने न सिर्फ नौकरी दी, बल्कि ज्वाइन करने के पहले दो-दो बार इजाफा भी दिया।

आखिरी सेमेस्टर बहुत मजे में कटा। नौकरी मिल गयी थी, केवल फक्का बचाना था। बहुत मेहनत की। End Sem के दिन पढ़ाई भी की और बचा लिया। मई 1996 में निकल लिए कानपुर से, हमेशा के लिए। गर्भ-नाल कट गया।

अब सोचता हूँ कि अगर एक-आध सेमेस्टर और रूक जाते तो शायद ज्यादा मज़ा आता। वैसे भी क्या उखाड़ लिये!

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13 thoughts on “बिहारी बाबू का कानपुर प्रवास

  1. बहुत बढ़िया। पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं।

    १९९५ में, मैं cdot का इंटर्व्यू दे रहा था। उसने पूछा – IAS दोगे? मुझे लगा – साला इसको कैसे पता चल गया। मुसकी मार दी। नौकरी रह गयी – पर करना किसे था। बिहारीपना और सादगी तो ले डूबी मुझे, चलो तुम्हें काम आ गयी।

    “आज उठती कोपलों की इस दुनिया में आकर
    हमारा दिल भी बेबस उठ बैठता है
    हमें याद आ जाते हैं वो दिन
    जब उमंगों में झूमते दिन थे
    उम्मीदों में बसी रात।
    मगर आज?
    आज तो दिन काटते फिरते हैं
    और रात काटनी पड़ती है”
    – राजा राधिका रमन प्रसाद सिंह (मैंने नहीं लिखा है, बात अछी कही, तो टोप के बैठे हैं आजतक).

    Those days were fun indeed, when you could afford to be yourself – with pride!

    • आपके शब्दों का चयन एवं प्रस्तुति अत्यंत सराहनीय है । आकाश में उड़ते पक्षी की ज़मीन से जुड़ी सच्चाई, आपकी सरलता एवं पारदर्शिता अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सफल हुई है ।

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