01 मई

आओ कुछ सैटेलाइट्स गिराएँ

आओ कुछ सैटेलाइट्स गिराएँ।

नोटबंदी – किसान हारा,
जॉब्स ढूँढ़ता यूथ बेचारा।
उनके दर्द दूर करें हम-
आज उनका दिल बहलाएँ।

आओ कुछ सैटेलाइट्स गिराएँ।

पॉलिसी, डिफ़ेंस, वर्ल्ड हंगर
सॉल्व करते हैं न्यूज़ एंकर।
उनकी ही फिर से सुनें हम-
कुछ सनसनीखेज कर जाएँ।

आओ कुछ सैटेलाइट्स गिराएँ।

नीति-अनीति, छल कपट से,
साम-दाम या दंड-भेद से,
जिनसे दिक़्कत हो उन सबका
वोटर लिस्ट से नाम हटाएँ।

आओ कुछ सैटेलाइट्स गिराएँ।

01 मई

पानी में पड़े कमल मुरझाने लगे हैं

पानी में पड़े कमल मुरझाने लगे हैं,
ये बादल भी आग बरसाने लगे हैं।

जिन दीवानों से उम्मीदें थी हमको,
वो सत्ता वाले ही हमे सताने लगे हैं।

रूह ही मैली हो चुकी जिन लोगों की,
चोला बदल वो फिर लौट आने लगे हैं।

खोखली हो गयी संसद की बुनियादें,
अब दीवारों में दीमक आने लगे हैं।

क्या हुआ है इन घर-बार वालों को,
कोठियों से सड़कों पर आने लगे हैं।

आज वीरान दिखाई देती है वो बस्ती,
बसाने में जिसको कई ज़माने लगे हैं।

खूब बदला है मंज़र इन हवाओं ने,
ये पत्थर भी अब गीत गाने लगे हैं।

कहीं चुनाव आसपस तो नहीं ‘नफ़्स’,
सफ़ेद पौशाक वाले नज़र आने लगे हैं।

01 मई

झूठा कवि

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

लिखा प्रपंच मानवता को
करुणा को तिरस्कार लिखा
वेदना में जब अश्रु फूटे
उस क्रंदन को अट्टाहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

समर में जब शोणित बहा
मैंने उसे शान्तिप्रयास लिखा
लाशों पर जब वेदना गरजी
उस गर्जन को परिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

क्रान्ति ज्वाल जब भड़की जन में
उस आग को मैंने ख़ाक लिखा
लिप्सा में मैंने बेचा खुदको
उस हवस को ज़ज्बात लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

पशु रक्षा में जब इन्सान कटे
मैंने इस हत्या को इन्साफ लिखा
जब भाई ने भाई को मारा
मैंने उस क्षण को उल्लास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

लिखा फ़रेब हर रिश्ते को
मैंने कृष्ण-प्रेम को विलास लिखा
सभ्यता को जो लील रही
उस खाई को आकाश लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

लिखा त्याग मैंने सत्ता को
घुप्प अँधेरों को प्रकाश लिखा
मिले घोषणा, वादे और प्रलोभन
मैंने जुमलों को भी विकास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

लिखा है बंधन को आज़ादी
मैंने मुक्ति को कारावास लिखा
सच-झूठ के फेर में आँखें मूंदी
लिखा झूठ, बदहवास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

01 मई

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं – दुष्यन्त कुमार

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़बान है झूठी जम्हूरियत की तरह
तू इक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यूँ तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लाएक़ तो है हसीन नहीं

ज़रा सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कॉलर हो आस्तीन नहीं

दुष्यन्त कुमार

01 मई

इन्दु जी क्या हुआ आपको – नागार्जुन

क्या हुआ आपको?
क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में
भूल गई बाप को?
इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!
क्या हुआ आपको?
क्या हुआ आपको?

आपकी चाल-ढाल देख- देख लोग हैं दंग
हकूमती नशे का वाह-वाह कैसा चढ़ा रंग
सच-सच बताओ भी
क्या हुआ आपको
यों भला भूल गईं बाप को!

छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको
काले चिकने माल का मस्का लगा आपको
किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको
अन्ट-शन्ट बक रही जनून में
शासन का नशा घुला ख़ून में
फूल से भी हल्का
समझ लिया आपने हत्या के पाप को
इन्दु जी, क्या हुआ आपको
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!

बचपन में गांधी के पास रहीं
तरुणाई में टैगोर के पास रहीं
अब क्यों उलट दिया ‘संगत’ की छाप को?
क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको
बेटे को याद रखा, भूल गई बाप को
इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी…

रानी महारानी आप
नवाबों की नानी आप
नफ़ाख़ोर सेठों की अपनी सगी माई आप
काले बाज़ार की कीचड़ आप, काई आप

सुन रहीं गिन रहीं
गिन रहीं सुन रहीं
सुन रहीं सुन रहीं
गिन रहीं गिन रहीं
हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को
एक-एक टाप को, एक-एक टाप को

सुन रहीं गिन रहीं
एक-एक टाप को
हिटलर के घोड़े की, हिटलर के घोड़े की
एक-एक टाप को…
छात्रों के ख़ून का नशा चढ़ा आपको
यही हुआ आपको
यही हुआ आपको

वैद्यनाथ मिश्र ‘नागार्जुन’
(‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ कविता संग्रह)

06 अप्रैल

पुण्य सँजो कई जन्मों का

पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ
अब झेलो मुझको, मैं तुम सबके पाप गिनाने आया हूँ

चाहा तो तुमने भी होगा कि मुझसे रिश्ता टूट सके
राह बदल कर, चाल बदल कर, मुझसे पीछा छूट सके
पर भाग्य ठगे न केवल मुझको, तुम भी उससे हारे हो
घूम-फिरे तुम दुनिया भर पर फिर भी साथ हमारे हो
बचा रह गया, भूला-बिसरा उधार चुकाने आया हूँ
पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ

अब साथ चल रहे मेरे तुम जो, थोड़ा ये उपकार करो
झेल रहे हो मुझको कब से, तो इतना और यार करो
लेन-देन का ये खाता, भई इसको यों ही चलने दो
हिसाब बराबर न हो देखो, कुछ तो बाकी रहने दो
समझो यों अगले जन्मों का व्यापार बढ़ाने आया हूँ
पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ

06 अप्रैल

सवाल उम्र भर के लिए

आई आई टी के चार साल
हर दिन एक अलग पन्ना
हर रात एक नया किस्सा
इन्ही पन्नों में इन्ही किस्सों में
उन दिनों जवान होती हमारी समझ से परे
ऐसा भी एक भी हिस्सा

वो हिस्सा
जहाँ हर जवाब बस एक सवाल बन के रह गया
जहाँ फलसफ़े की रोशनी में नहा के
ज़िन्दगी अंधेरों से ज्यादा काली दिखने लगी
और हर यकीन सिर्फ एक ख़याल बन के रह गया

वो भी तो दोस्त था, वो भी था हमसफ़र
तमाम और लोगों सा,
वक़्त से जूझता उधेड़ता बुनता
किताबों, इम्तहानों, कैंटीन, लाइब्रेरी और
वक़्त बेवक़्त के बुल्लों में यहाँ-वहाँ
शायद कुछ कम कहता मगर सबकी सुनता

पर हमें क्या पता
कि उम्मीदों के इस मंदिर में भी
किन खयालों के दाँव-पेंच से वो मज़बूर हो गया
दोस्ती और दुनियादारी के दायरों से आगे
साथ रह के भी न जाने कब इतना दूर हो गया

हम अपने सपनों को ज़िन्दगी समझते रहे
और वो ज़िन्दगी को फ़िज़ूल का सपना
हमारी जद्दोजहद थी सफ़र शुरू करने की
और उसका जुनून बन गया सफ़र खत्म करना

साथ बैठे, वक़्त गुजारा
तहे दिल से कोशिश की
समझने और समझाने में कुछ और वक़्त बीत गया
हमारे सब फलसफे हार गए
आखिर एक दिन उसका जुनून जीत गया

उस रोज आई आई टी में फिर से
एक और सांस ज़िन्दगी के हाथों से फिसल गई
एक बार फिर अपने जवाबों की तलाश करते करते
किसी की तलाश एक उम्र भर के सवाल में बदल गयी