01 मई

गाय पर निबंध

बचपन में खूब सोचा करते थे कि कभी यह कारनामा भी कर दिखाएँगे, जीती-जागती गाय पर निबंध लिख कर भाग आएँगे। पर क्या कहें, कभी इतनी हिम्मत ही नहीं जुटा पाए, तो गाय तो कभी मिली नहीं। हैसियत के अनुरूप बकरी के ऊपर निबंध जरूर लिखा, और खूब वाहवाही भी बटोरी। और क्यों न हो, आख़िर हमारे राष्ट्रपिता गाँधी बकरी का दूध पीकर ही तो इतने प्रसिद्ध हुए थे। मन ही मन आंदोलन छेड़ने की ठान ली, कि स्वतंत्र भारत के सभी विद्यालयों में गाय की जगह बकरी पर निबंध को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। बकरी पर निबंध स्वाभाविक है कि छोटा भी होगा, उसे अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए इतने शब्दों में फैलना नहीं पड़ेगा। पर माँ तो माँ होती है न। कभी किसी को कहते सुना है ‘बकरी माँ’? कोई कभी अपनी माँ को बकरी दिखाते हुए यह भी न कहे कि ‘क्या बकरी है, माँ!’ भले ही वहाँ से उस समय कितनी ही उत्कृष्ट बकरी क्यों न गुज़र रही हो।

शिष्टाचार एवं बड़ों का आदर करना हमारे खून में है। ठीक उसी तरह जैसे चोरी, बेईमानी, और झूठ बोलना हमारे खून में है। भारत के रक्त में यह सभी कण आपसी सौहार्द एवं प्रेम के साथ रहते हैं। और इन सबको जोड़ के रखने का काम मुनाफ़ा करता है, शुद्ध लाभ। वैसे यह कहना आवश्यक नहीं, क्योंकि लाभ कभी अशुद्ध हो ही नहीं सकता, यह तो सब जानते हैं, और अशुभ भी नहीं हो सकता। साक्षात् लक्ष्मी माता को अशुभ कहने की उद्दंडता कौन कर सकता है? मुनाफ़ा सूँघ लेने की हमारी शक्ति भी अनेक कल्पों, युगों, जन्मों से विकसित होती आ रही है। और इसी आंतरिक शक्ति ने, जो कि हमारे रक्त में प्रवाहित हो रही है, हमें यह सिखाया है कि निबंध लिखना है तो गाय पर लिखो, बकरी पर निबंध लिखोगे, तो राह चलते लोग यही कहेंगे कि अमां क्या बक रिया है। तो आइए, प्रारम्भ करते हैं।

गाय हमारी माता है, हमको कुछ नहीं आता है। यह प्राथमिक विद्यालयों में उत्पन्न लोकोक्ति आज विजय के मूल मन्त्र का रूप ले चुकी है। जिसने इसे सिद्ध कर लिया, समझिए उसे कोई नहीं हरा सकता। गौ माता भेदभाव नहीं करतीं, आप उनकी प्रशंसा और भक्ति करें या अवमानना, माता सभी बच्चों को समान अवसर एवं फल प्रदान करती हैं। पूर्व वैदिक काल में तो पूरी अर्थव्यवस्था ही गौ माता पर आधारित थी। जिसके पास जितना गोधन, वह उतना सुखी। उत्तर वैदिक काल में कृष्ण गौ माता की आराधना करके स्वयं ईश्वर पद को प्राप्त हुए। महर्षि वशिष्ठ से कामधेनु बलपूर्वक भी न ले पाने पर विश्वामित्र का मोहभंग हो गया और उन्हें वैराग्य की प्राप्ति हुई, फिर वे महान राजर्षि विश्वामित्र के रूप में प्रसिद्ध हुए। बताया तो, आप गौ माता के पक्ष में हैं या उनके विरुद्ध, इस से गौ माता को कोई फर्क नहीं पड़ता। समान फल की प्राप्ति होगी।

बस यह कलियुग ही है जहाँ हमें गौ माता की उपेक्षा देखने को मिलती है। सडकों पर बैठीं कचरा खाती हमारी गौ माता को देख कर हमारे अंदर की मानवता के कान पर जूँ भी नहीं रेंगती। यह भी हमारे खून में है – फ़र्क नहीं पड़ना। यह विधा इतनी आसानी से विकसित नहीं होती। साधारण मनुष्य ऐसा कर पाने में असमर्थ होता है। दूसरे देश वालों को देखेंगे तो पाएँगे कि उनके संस्कारों में यह है ही नहीं। यह भारत की अमूल्य विरासत है, निधि है। हमारे पूर्वजों ने कई जन्मों की तपस्या के बाद इसे प्राप्त किया था। हमें फ़र्क नहीं पड़ता, किसी भी बात से। धन्य है यह भारत भूमि जिसे हम जैसी निकम्मी संतान का सुख प्राप्त हुआ। ध्यान की ऐसी पराकाष्ठा इंटरनेट और टीवी पर योग को योगा बता कर बेचने वालों के स्वप्न के भी परे है। यह तो समाधि स्तर की बात है। फ़र्क नहीं पड़ता है। गौ माता को गौ माता कह दिया और हो गया काम। बाकी माता अपना खुद देख ही लेंगी। न्यायालय बीच-बीच में गौ माता के विश्राम में विघ्न डालते पाए जाते हैं, गौ माता उन्हें भी कुछ नहीं कहतीं।

राजनीति में गौ माता का विशेष महत्त्व है। त्रेतायुग में कामधेनु बस एक थी, और आज देखिए, हर गईया कामधेनु है। गौ माता राजनीति का वह टिकट हैं जो आसानी से उपलब्ध है। भारतीय समाज का वह हिस्सा जो आज भी अपने को सनातन धर्म का अनुरागी बताता है, अपनी ग्लानि को गौ माता के नाम पर राजनीति से शांत करने का भरसक प्रयास करता है। संस्कृति एवं संस्कारों की रक्षा होनी ही चाहिए, और हमें अभी बहुत लम्बा सफ़र तय करना है। पहले गौ माता को सडकों से उठा कर गौशालाओं तक पहुँचाना आवश्यक है। समाज में जनधारणा बनाना आवश्यक है। पर प्रश्न यह उठता है कि ऐसा करे कौन? यह भी हमारे खून में है। आशा करना कि कोई दूसरा आकर हमारे काम कर दे। हमने धर्म की रक्षा का ठेका धर्म की राजनीति करने वालों को दे दिया है। गौ माता को बचाने का कितना लोगे? बस धरना-प्रदर्शन करेंगे, थोड़ी हिंसा होगी, यह सब तो स्टैंडर्ड सर्विस पैकेज का हिस्सा है, संसद में कानून लाने का अलग से मूल्य लगेगा।

जिनको गाय बचानी है और जिनको गाय खानी है, उनके बीच का यह सांस्कृतिक द्वंद्व राजनैतिक दृष्टिकोण से बहुत लाभदायक है। हमारी लाभ सूँघ लेने वाली शक्ति को याद कीजिए। और फ़ायदा दोनों पक्षों का होता है, इसे कहते हैं ‘विन विन सिचुएशन’। जिसे गाय खानी हो खाए, जिसे गाय बचानी हो बचाए, हमें तो भैया बस गौ माता की पीठ पर बैठ कर लोकसभा तक जाना है।

01 मई

एक दुःखद प्रेम कहानी

श्री गणेश

आइए कहानी का श्री गणेश अपनी नायिका कजरी के एक व्हाट्सएप्प सन्देश से करते हैं जो उसने केतुल मंदी को लिखा था।

“प्यारे केतुल बाबा…”

ओहो, मैं भी ना! आप तो जानते ही नहीं कि ये कजरी कौन हैं और केतुल मंदी से इसका क्या रिश्ता था। आप को इनके व्हाट्सएप्प संदेशों से क्या लेना देना? अरे तो चलिए फिर कहानी में सबसे पहले अपने नायक और नायिका का परिचय आपसे करवाता हूँ।

परिचय

दर असल मंदी खानदान शहर का सबसे पुराना और रसूख वाला खानदान था। इस खानदान की शुरूआती पीढ़ियों ने अपने व्यापार की दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति होते देखी थी। एक जमाना था कि पूरे शहर में केवल और केवल मंदी प्रोडक्ट्स की ही बिक्री होती थी। ख़ानदान की शुरूआती पीढ़ी ने थोड़ी बहुत दान-दक्षिणा कर के शहर के ज्यादातर निवासियों का दिल भी जीत लिया था।

कहते है इस खानदान का नाम हमेशा से ‘मंदी’ खानदान नहीं था। इस बारे में विभिन्न मत थे कि कब और कैसे इन लोगों का नाम मंदी पड़ गया था। एक किवदंती के अनुसार पुराने समय में मंदी नाम के एक बहुत ही दयालु अविष्कारक हुए थे और किसी कारणवश ख़ुश होकर उस दयालु अविष्कारक ने न सिर्फ अपनी पूरी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी बल्कि मंदी नाम का कॉपीराइट भी इनको सौंप दिया था। कुछ लोग ये भी कहते थे कि इन लोगों ने कॉपीराइट चुरा लिया था। आज कल कुछ लोग मजाक में ये भी कहने लगे थे कि इस नाम की वजह से उनकी आज की पीढ़ी मंदबुद्धि हो रही है। खैर हमें क्या?

इनके बारे में कुछ और भी बताना जरूरी समझता हूँ।

पिछले कुछ सालों में मार्केट में नयी कंपनियों के आ जाने से इनके कारोबार में कुछ कमी तो आयी थी मगर हाथी मरा भी तो नौ लाख का। खास तौर पर मंदी खानदान की बहू मैडम मोना मंदी जी के बिज़नेस सेंस की तो सभी तारीफ करते हैं। इन्होने इन नयी कंपनियों से कई समझौते किये जिसके तहत नयी कंपनियाँ अपने खुद के प्रोडक्ट्स बनाने की बजाय इन्हीं का माल डिस्ट्रीब्यूट करती थीं और मुनाफे में अपना हिस्सा ले लेती थीं। मंदी ख़ानदान की धन सम्पदा में कोई कमी नहीं आयी थी। हमारा नायक केतुल इसी खानदान का इकलौता वारिस और मैडम मोना का बेटा है।

बहुत हो गया मंदी खानदान के कारोबार का वर्णन। आप थोड़ा बोर फील कर रहे होंगे। सॉरी सॉरी। अपने कनाडा वाले शुकुल जी कहते हैं कि कहानी में बीच-बीच में मसाला डालते रहो तो पाठकगण का चाव बना रहता है। तो लीजिये पेश है कुछ मसाला। मेरा मतलब कजरी का परिचय।

पिछले साल से शहर में कजरी नाम की एक बेहद खूबसूरत नृत्यांगना रहने लगी है। एक तो बला की खूबसूरत उस पर मनमोहक नृत्य की अदाएँ। एक ही नज़र में लोगों को दीवाना बना देती है कजरी। उसके नृत्य के कार्यक्रम तो इतने लोकप्रिय हो रहे थे कि थिएटर में पाँव रखने की जगह भी न बचती थी। कभी तो एक उन्मुक्त किस्म की मादकता और कभी शालीन सी शास्त्रीय भाव भंगिमा, सब कुछ है कजरी के नृत्य में। संगीत की धुन से साथ उसके उठते गिरते उरोजों को देख तो कई नवयुवकों की आह निकल जाती थी। और कजरी के चहेरे में जो भोलापन था वो शहर की किसी अदाकारा में न था। कजरी इज़ द बेस्ट इन द बिज़नेस।

वैसे मन तो चाहता है कि मैं कजरी की खूबसूरती का वर्णन करता ही जाऊँ, उसके अंग-प्रत्यंग की बारीकी से विवेचना करूँ। शायद आप भी यही चाहते होंगे क्योकि शुकुल जी के अनुसार आपको तो मसाला चाहिए, मगर आपको जो भी चाहिए अपने मन में उसका आनंद लीजिये। मुझे तो कहानी आगे बढ़ानी है और समय है कम। तो आइए आगे बढ़ते है।

नया स्टार्टअप

आज मंदी महल में तनाव का माहौल है। मैडम मोना ने वफादारों की मीटिंग बुलाई है। हमेशा की तरह सोफे पर मैडम और उनके सुपुत्र केतुल बैठे हैं। आस पास सारे वफादार नौकर-चाकर हाथ जोड़ कर खड़े है। आज मैडम बहुत गुस्से में हैं, न जाने किस पर गाज गिरेगी। मैडम के सबसे करीबी दो नौकर जो मंदी खानदान की नौकरी ज्वाइन करने के पहले जाने माने वकील थे। मिस्टर सिंपल सवाल, और मिस्टर बुद्धू बन्दरम् उनके सबसे पास खड़े थे। एक बूढ़ा वफादार नौकर चुप्पी सिंह थोड़ी दूर पर खड़ा था। मैडम आज कल उसका चेहरा देखना भी न पसंद करती थीं।

मैडम: “तुम लोग धीरेन्द्र के बारे में क्या कर रहे हो? एक-एक करके उसकी स्टार्टअप हमारे सारे कस्टमर्स खाये जा रही है। इन्वेस्टर्स भी उसपर पैसा लगा रहे हैं। वो हमें खुले आम चैलेंज कर रहा है कि वो हमारी कंपनी को नेस्तनाबूत कर देगा। और तुम सब निकम्मे लोग हाथ पर हाथ धर कर बैठे हो। याद रखना जिस दिन ये कंपनी बंद हो गयी तुम दो कौड़ी के लोग भूखे मर जाओगे।”

मैडम का आग बबूला होना जायज़ था। धीरेन्द्र एक नए ज़माने का सीरियल entrepreneur था। उसकी पहले की स्टार्टअप ने इन्वेस्टर्स को बहुत अच्छे रिटर्न्स दिए थे। मगर इस बार तो धीरेन्द्र ने शहर के सबसे बड़े कारोबारी मंदी खानदान के ही बिज़नेस को डिसरप्ट करने की सोच ली थी। उसके बीटा कस्टमर्स उससे बहुत खुश थे। मंदी प्रोडक्ट्स के मुक़ाबले धीरेन्द्र के स्टार्टअप की प्रोडक्ट क्वालिटी बहुत अच्छी थी, दाम बहुत वाजिब थे और तो और वो अपनी मार्केटिंग करने में भी बहुत चतुर था।

मैडम का गुस्सा देख किसी से कुछ भी बोलते न बना। केतुल अपने हाथ में मोबाइल लिए था और उस पर शायद PUBG खेल रहा था इसलिए उसका ध्यान तो इस मीटिंग पर नहीं था मगर बाकी लोग एक-दूसरे का चेहरा देख रहे थे। दो मिनट के जानलेवा सन्नाटे के बाद मिस्टर सवाल कुछ कहने की हिम्मत जुटा पाए थे। बोलने के लिए पहले 15-20 सेकंड तक गला साफ़ करते रहे। शायद मैडम का ध्यान आकर्षित करना चाहते थे।

मैडम: “अब कुछ फूटेगा तुम्हारे मुँह से या बस गला ही साफ़ करते रहोगे?”

मिस्टर सवाल: “सॉरी मैडम। दर असल एक आईडिया है।”

मैडम: “हम्म…”

इस हम्म की रहस्यमयी गुफा में न जाने कितने गये मगर लौट कर न आये। आज सवाल की इज्जत का सवाल था। केतुल को छोड़ सब लोग उसकी ही तरफ देख रहे थे की ये बूढ़ा सवाल न जाने क्या कहने वाला है।

मिस्टर सवाल: “मैडम आपने कजरी के बारे में सुना है?”

कजरी का नाम जैसे केतुल के मोबाइल में interrupt सिग्नल बन कर आया था। अपना गेम बीच में ही छोड़ केतुल एकदम से चौंक कर उठा।

केतुल: “मैंने सुना है। बहुत खूबसूरत है वो तो।”

मैडम को अनुशासन तोड़ने वाले लोग कतई पसंद न थे मगर केतुल का वो कर भी क्या सकती थीं। इकलौता बेटा था उनका। उसी के लिए तो वो ये सब कर रहीं थीं। बस एक नजर देखा केतुल की ओर और फिर देखा सवाल की तरफ सवालिया नजर से।

सवाल: “मैडम मैं कहना चाहता हूँ कि ये कजरी बहुत लोकप्रिय हो रही है। हम थोड़ा इससे coordinate करते है। वो अपने कार्यक्रमों में धीरेन्द्र के प्रोडक्ट्स की बुराई करेगी तो लोग सुनेंगे भी। इसकी पढ़े लिखे और सभ्य समाज में भी अच्छी साख है। हमारे कई कस्टमर्स इसके प्रोग्राम देखने जाते है।”

मैडम: “OK! सवाल, तेरा दिमाग तो अच्छा चलता है रे। कल ही बुला ले उसको। मैं खुद बात करुँगी।”

मैडम के चेहरे के भाव एक पल को भी नहीं बदले मगर सब समझ गए थे की मैडम को सवाल का आईडिया अच्छा लगा था। सब लोग खुश थे, और सवाल, उसे तो जैसे पर लग गए हों।

अच्छा इसी सबके बीच पता नहीं किसी ने ध्यान दिया की नहीं, एक इंसान तो बस मंद-मंद मुस्काये जा रहा था। आज की रात उसे नींद गंवारा न थी। बात ये है कि पिछत्तीस बसंत देख लेने के बावजूद केतुल बाबा के हृदय में प्रेम का पुष्प अभी तक खिला नहीं था। ऐसा नहीं था कि ये भंवरा किसी कली पर मंडराया नहीं था, मगर मैडम जी ने उसके लिए जो सपने देखे थे उनमें प्रेम का कहीं कोई स्थान नहीं था उसके जीवन में। जिस भी कली के मोहपाश में वो फंसा मैडम ने उसे मसल कर रख दिया।

लव ऐट फर्स्ट साईट

मगर आज बात कुछ और थी। आज की रात कुछ और थी।

केतुल के आलावा आज की रात दो और आँखें थीं जिनमें नींद नहीं थी। कजरी को मैडम का सन्देश रात में ही मिल गया था। पहले तो कजरी को विश्वास ही नहीं हुआ। विश्वास आया तो रात भर बिज़नेस प्लान बनाती रही। मैडम से क्या कहेगी और क्या नहीं कहेगी सब मन में कई बार रिहर्स कर लिया था। मैं अपनी खुद की नाट्य मण्डली के जो सपने देख रही हूँ शायद उसमें इतने अमीर लोगों से ही पहला निवेश मिल जाए?

कजरी मंदी महल टाइम से थोड़ा पहले ही पहुँच गयी। पता चला कि मैडम दिए हुए टाइम से पहले किसी से नहीं मिलती हैं इसलिए इंतजार करना होगा। सामने एक खूबसूरत फूलों का बाग़ था और वो वहाँ जैसे अपने आप ही खिंची चली आयी। ऐसा खूबसूरत महल और बाग़ उसने फिल्मों में या ट्रैवेल मैगज़ीन में ही देखा था। कजरी जैसे किसी दिवास्वप्न में चली गयी थी। उसके मुँह से सहसा निकल गया “हाय ये सब कितना खूबसूरत है।”

“मगर आप से ज्यादा नहीं,” एक आवाज ने जैसे उसे अपने खूबसूरत स्वप्न से जगा दिया था।

“जी थैंक यू,” सकुचाते हुए कजरी ने मुड़ कर देखा। ये केतुल है कजरी को पहचानने में क्षण भर भी न लगा, मगर कजरी वो क़ातिल है जिसके हाथों में लोग खंजर थमा कर अपना जिगर चाक होते देखना चाहते है। मर्दों की बनायी इस दुनिया में अपना मुक़ाम हासिल करने चली थी कजरी। इतनी जल्दी बोल्ड हो जाए ऐसी खिलाड़ी न थी वो।

“आप कौन?” कजरी ने पूछा।

“क्या तुम्हें सच में नहीं पता है मैं कौन हूँ?”

“जी नहीं।”

कजरी और केतुल की इस पहली मुलाक़ात का किस्सा बयाँ करते हुए पता नहीं क्यों मुझे चेतन शर्मा जावेद मियांदाद को बोलिंग करते याद आ रहे है। पता है कि बहुत ही गैर रोमानी सी उपमा है मगर लेखन का पहला उसूल है ईमानदारी। अपने पाठकों से मैं छल नहीं कर सकता।

केतुल को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वैसे ये बात कोई समझने-समझाने वाली थी भी नहीं, सिर्फ महसूस की जा सकती थी। तीर-ए-नीमकश का दर्द तो वही बयाँ कर सकता है जिसको लगा है। कजरी का हुस्न, कजरी की सादगी और कजरी का भोलापन, केतुल के दिल-ओ-दिमाग पर आज से इसी का कब्ज़ा था।

“मैं केतुल,” केतुल बाबा उसकी तरफ टकटकी लगा कर देखते हुए बोले।

“ओह! अच्छा, माफ़ कीजियेगा, पहचाना नहीं।”

इसी बीच मैडम का बुलावा भी आ गया था। चलिए अब वहीँ चलते है।

डील

महफ़िल वैसी ही जमी है और सारे नौकर खड़े है। मगर कजरी ने पास में सोफे कि एक खाली कुर्सी देख कर उसे मैडम के पास खींच लिया और उस पर बैठ गयी। मैडम को आदत नहीं है कि लोग उनके सामने बैठें मगर ये लड़की हमारे काम की हो सकती है ये सोच कर मैडम ने इस बात को नज़र-अंदाज़ करना ही बेहतर समझा। हालाँकि अनजाने में ही सही उनकी जुबान पर कुछ एक्स्ट्रा तल्खी जरूर आ गयी थी।

इसके पहले की कजरी कुछ भी कह पाती, मैडम ने उसको हिकारत से देख कर कहा, “सुना है तू आज कल बहुत मशहूर हो रही है। मेरा एक काम करेगी?”

कजरी की हाँ या न का इंतजार किये बगैर मैडम ने सारी प्लानिंग सुना डाली और आखिर में पूछ लिया “क्या पैसे भी लेगी इसके लिए?”

कजरी अभी अपमान का घूँट पी रही थी। सोच रही थी कि क्या जवाब दिया जाये। ये एक बढ़िया डील बन सकती है। कुछ देर के स्वाभिमान के चक्कर में बढ़िया डील से हाथ न धो बैठूँ।

इधर केतुल हमेशा की तरह मम्मी के बगल में ही बैठा है। मम्मी का मंदी खानदान की होने वाली बहू से ऐसे बात करना उसे अच्छा नहीं लग रहा था मगर मम्मी की बात काट भी तो नहीं सकता है। तो मम्मी के प्रश्न ने उसको मौका दिया जिसे बिना मौका गवाएँ केतुल ने लपक कर पकड़ लिया।

“क्या मम्मी आप भी? बिना पैसों के कोई इतना बड़ा काम कैसे कर सकता है? मुझे लगता है कि कजरी जी को इस काम के लिए कम से कम सौ करोड़ लगेंगे? सही कह रहा हूँ न कजरी जी?” केतुल को समझ नहीं आ रहा था की इस कजरी को कैसे इम्प्रेस करे। पैसे की कोई भी संख्या देना खतरे से खाली नहीं है। अगर कम पैसे बोले तो कजरी उसे चीप भी समझ सकती है।

“नहीं जी, बात ये नहीं है…” कजरी ने कुछ कहना ही चाहा कि केतुल ने उसे बीच में ही टोक दिया।

“अगर सौ करोड़ कम हैं तो हजार करोड़ कर लेते हैं। आप चिंता न कीजिये हमारे पास बहुत पैसे हैं।” केतुल से अपनी घबराहट दबायी नहीं जा रही थी।

अब मैडम का गुस्सा बढ़ रहा है। इसके पहले ये लड़का मेरी पूरी जायदाद बिकवाये इस लड़की के चक्कर में, क्यों न डील फाइनल कर दी जाए।

मैडम: “ठीक है लड़की, तो डील फाइनल करते हैं। पैसे तुम्हारे पास टाइम से पहुँच जाया करेंगे मगर हमारा काम अगर ईमानदारी से नहीं किया तो बहुत पछताएगी। एक बात और, किसी को इस बात की कानों कान खबर नहीं होनी चाहिए।”

जो कुछ भी आँखों के सामने घट रहा था ये सपना था या हकीक़त? कजरी के लिए कह पाना कठिन था। अरे उसे तो हजार करोड़ में कितने शून्य होते है ये जोड़ पाना भी मुश्किल लग रहा था।

बस कह पायी, “मैडम मेरी ईमानदारी पर आज तक किसी को कभी कोई शक करने की जरूरत नहीं हुई।”

जाते जाते कजरी ने मुड़ कर एक बार केतुल की तरफ कृतज्ञ निगाहों से देखा। थैंक यू कह रही थी, मगर केतुल बाबा को पता नहीं क्यों लगा कि वो जाते जाते प्रणय निवेदन कर गयी है। क्या आग दोनों तरफ बराबर की लगी है?

कजरी की नाट्य मण्डली

कजरी को अपने प्रारब्ध पर यकीन हो चला था। वो इस दुनिया पर राज़ करने आयी है। ये शहर क्या चीज है। मेरी नृत्य मण्डली दुनिया की सबसे हसीन जगहों पर प्रोग्राम करेगी। एक से एक दुनिया भर के रईस मेरे सामने पानी भरेंगे। दुनिया की बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में मेरे इंटरव्यू छपा करेंगे। आज कजरी अपने आप को रोक नहीं पा रही है।

मंदी महल से घर के रास्ते में ही कजरी ने सारा प्लान सोच लिया था। अपनी नाट्य मण्डली को जल्दी से जल्दी रजिस्टर करवा कर सारी कानूनी औरचारिकताएँ पूरी करनी पड़ेंगी। चूँकि इस पैसे को बाहर नहीं दिखा सकते है तो नाट्य मंडली में लोगों से पैसा लेने का ढोंग करना पड़ेगा। मण्डली का नाम ही ‘आप का पैसा’ रख देंगे ताकि किसी को कोई शक न हो।

कल ही कुछ न्यूज़ चैनल वाले बता रहे थे कि धीरेन्द्र के प्रोडक्ट्स में कोई दम नहीं है। बस मार्केटिंग के दम पर वो लोगों को बेवकूफ बना रहा है। लेकिन उसकी मार्केटिंग मेरे नृत्य के सामने कहाँ ठहरेगी? लोगों को उसके विरुद्ध विश्वास दिलाना बहुत कठिन न होगा। लोगों को शक न हो इसलिए मंदी के प्रोडक्ट्स की भी थोड़ी बहुत कमियाँ बता दिया करुँगी।

‘आप का पैसा’ नृत्य मंडली ने शुरुआत से ही खूब धूम मचाई। ये कजरी की लोकप्रियता का ही असर था कि कई लोगों ने खुद अपनी नौकरियाँ छोड़ कर ‘आप का पैसा’ नृत्य मण्डली को सफल बनाने का जिम्मा लिया।

हालाँकि इधर कजरी जब अपने इंटरव्यूज और प्रोग्राम्स में धीरेन्द्र के प्रोडक्ट्स को भला बुरा कहने लगी, तो लोगों को ये कुछ अजीब लगा मगर उन्होंने इसे कजरी का भोलापन समझ कर नज़र अंदाज़ कर दिया।

अधूरा प्यार

इधर जबसे केतुल बाबा की आँखें कजरी से चार हुई थीं उनका पिछत्तीस वर्षीय कोमल बाल मन कभी स्थिर हो ही नहीं पाया था। बस तसव्वुरे-जाना किये बैठे रहते थे। एक मीठी मीठी सी खलिश हर वक़्त रहती थी।

चूँकि उन्हें शक था की मम्मी ने कजरी का फ़ोन टैप करवाया है वो उसे कभी कॉल नहीं करते थे। । केवल व्हाट्सएप्प सन्देशों से काम चला लेते थे। ज़माने को कजरी और केतुल का प्यार पता न चले इसलिए वो सन्देश करते ही उसे डिलीट भी कर देते थे।

शुरू शुरू में कजरी ने जरूर उनके कुछ सन्देशों का जवाब दिया, जिसे लेकर केतुल बाबा को ऐसा लगा कि वो भी इनसे उतना ही प्यार करती है जितना ये उससे। मगर जैसे जैसे कजरी की नाट्य मण्डली आगे बढ़ी कजरी के पास केतुल बाबा के सन्देशों के लिए समय नहीं रह गया था।

कजरी दरअसल एक महत्वकांछी और नए ज़माने की महिला थी। उसके लिए प्रेम उसकी तरक्की में रोड़ा था। वो इन सब झंझटो में नहीं पड़ना चाहती थी।

कई एक तरफ़ा व्हाट्सएप्प सन्देशों के बाद एक समय ऐसा आया जब केतुल कजरी से मिलने के लिए बेकरार हो गया। उसने कजरी को अंतिम चेतावनी दे दी, “वो उससे मिलने आ रही है कि नहीं? नहीं तो वो दुनिया को उसकी नाट्य मण्डली का सच बता देगा” केतुल के मन में तो सिर्फ कजरी के लिए प्रेम की ज्वाला थी जो उसे मजबूर कर रही थी। वो सच में थोड़े ही कुछ करने वाला था। प्रेमी कहीं एक-दूसरे के साथ ऐसा विश्वासघात करते हैं?

मगर कजरी इस सन्देश को पढ़ कर आग बबूला हो गयी। गुस्से में आ कर उसने एक ऐसा सन्देश लिखा जो उसे कभी नहीं लिखना चाहिए था। ये वही वाला सन्देश है जिसका ज़िक्र मैंने इस कहानी का श्री गणेश करते समय किया था।

“प्यारे केतुल बाबा। भूल कर भी ऐसी गलती नहीं करना। तुम्हारे खानदान के काले कारनामों के कच्चे चिट्ठे हैं मेरे पास। जिस दिन मैंने वो पब्लिक कर दिए तुम लोगों को पानी भी नहीं मिलेगा इस शहर में। और प्यार-व्यार तो भूल ही जाओ। तुम्हारे जैसे मंदबुद्धि इंसान से कौन प्यार कर सकता है? तुम्हें मेरा background पता है न? इस शहर के सबसे टॉप के स्कूल से पढाई की है मैंने। आज दुनिया में लोग मेरे दीवाने हैं। तुम चीज क्या हो?”

रात के करीब १० बजे होंगे जब केतुल को कजरी का ये संदेश मिला। बीप की आवाज़ आते ही केतुल ने जैसे ही फ़ोन उठाया और नोटिफिकेशन में कजरी का नाम देखा, केतुल की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसे लगा मेरी कजरी ने आखिरकार मेरे लिए समय निकाल ही लिया। मगर जैसे जैसे उसने सन्देश पढ़ा उसका दिल बैठने लगा। ये कजरी तो शायद मुझसे कभी प्रेम करती ही नहीं थी। केतुल की सारी ख़ुशी एक अजीब किस्म के ग़म में बदल गयी थी। ऐसा लगा जैसे सर पर किसी ने बहुत जोर से प्रहार किया हो। गिरते-गिरते भी केतुल ये वाला व्हाट्सएप्प सन्देश डिलीट करना नहीं भूला था। वो अभी भी सोच रहा था की कजरी पर कभी कोई इल्जाम नहीं लगना चाहिए।

केतुल बाबा के कमरे के बाहर खड़े उनके बॉडीगार्ड ने उस रात दो आवाजें सुनी। पहली ‘ठऽऽऽ ढाँग’ ये शायद केतुल बाबा का मोबाइल उनके हाथ से छूट कर गिरने की आवाज थी, और दूसरी ‘ढऽऽऽ प्प!’ क्या ये केतुल बाबा के गिरने की आवाज़ है? उसको लगा कि दाल में कुछ काला है। वो भाग कर अंदर गया, और केतुल को अपने हाथों में ही उठा कर भागा।

ऑपरेशन

एक घण्टे के अंदर अंदर सारी मॉडर्न स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस एक विमान न्यूयॉर्क के रास्ते पर था। विमान में डॉक्टर्स और नर्सेज के अलावा मैडम मोना और उनका एक और वफादार डिक्की सवार थे। मैडम मोना ने रोना कभी सीखा ही नहीं था। कजरी की ही तरह उन्होंने भी मर्दो की बनायीं इस दुनिया में अपना एक अलग मुक़ाम बनाया था। शायद इसी वजह से वो थोड़ा पत्थरदिल हो गयीं थी। मगर आज उनका दिल भारी था। केतुल ही तो था इकलौता वारिस उनके इतने बड़े कारोबारी साम्राज्य का।

न्यूयॉर्क के सबसे जाने माने ब्रेन सर्जन डॉक्टर गाएथोंडे दुनिया भर में जानी मानी हस्ती हैं। मैडम मोना के एक कॉल पर उन्होंने सारे अपॉइंटमेंट्स कैंसिल कर दिए।

हॉस्पिटल के गलियारे में मैडम तेज तेज कदमों से चहलकदमी कर रही हैं और डिक्की उनके पीछे पीछे। पता नहीं क्या कहेंगे डॉक्टर गाएथोंडे।

थोड़ी ही देर में डॉक्टर साहब प्रकट हुए।

डॉक्टर गाएथोंडे: “मैडम बैड न्यूज़ ये है कि बहुत ज्यादा ब्रेन डैमेज है। गुड न्यूज़ है की हम केतुल बाबा को बचा सकते है। आज हेल्थ साइंसेज इतना तरक्की कर गयी है कि इसमें कोई चमत्कार नहीं रह गया है। मगर टाइम बहुत कम है।”

मैडम: “तो देर क्यों कर रहे हैं डॉक्टर? ऑपरेशन शुरू करिए।”

डॉक्टर गाएथोंडे: “बस आपका कॉन्सेंट लेना था। कुछ जरूरी बातें आपको बतानी हैं। ऑपरेशन के बाद 3-4 महीने लगेंगे केतुल बाबा को पूरी तरह रिकवर होने में। वैसे तो उन्हें जीवन के सामान्य कार्यों में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, मगर उनकी याददाश्त और सोचने समझने की क्षमता काफी कम हो जाएगी। एक बार में 3-4 बातों से ज्यादा याद नहीं रख पाएँगे।”

मैडम (काफी बुझे मन से): “केतुल को बचाना हमारी प्राथमिकता है अभी। आप जाइए मैं साइन कर देती हूँ।”

डॉक्टर गाएथोंडे के जाने के बाद मैडम धीमे धीमे से डिक्की की तरफ मुड़ीं। डिक्की उनका चेहरा ऐसे देख रहा था जैसे किसी का पालतू जानवर अपने मालिक के दुखी चेहरे को पढ़ लेता है, लेकिन उसे पता नहीं होता है कि करना क्या है?

मैडम: “सोचने समझने की क्षमता, याददाश्त कम हो जाएगी? वैसे ही बिज़नेस में इतनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, पहले तो हमें कस्टमर्स का चेहरा देखने की भी जरूरत नहीं होती थी, मगर अब वो कहते हैं आप आईए और अपने प्रोडक्ट्स के बारे में बताइए। धीरेन्द्र इतना चालू और तेज दिमाग वाला है, उसका सामना कैसे कर पायेगा केतुल?”

डिक्की को पता था कि पहले ही केतुल के लिए ये सब कुछ मुश्किल था अब तो समस्या और गंभीर हो जाएगी। मगर डिक्की आसानी से हार मान जाने वालों में से नहीं है? उसने खुद मार्केट में अपने इन्नोवेटिव मार्केटिंग कैम्पेन से अपनी एक साख बनायी थी। इस कैंपेन का नाम उसने ‘बिलो द बेल्ट’ कैंपेन दिया था।

सवाल: “मैडम वो सब आप मुझ पर छोड़ दीजिये। केतुल बाबा को हम लोग 3-4 बातें ही याद करवा देंगे जो वो हर कस्टमर मीटिंग में बोलेंगे। बाकी कोई ज्यादा प्रश्न होंगे तो हम सब हैं ही। हम लोगों के होते हुए बाबा के ऊपर कोई आँच नहीं आने देंगे।”

डिक्की के गंजे सर के नीचे बिल्ली जैसी शरारती आँखे थीं, और उन आँखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा। एक बार किसी कस्टमर ने डिक्की के चेहरे पर बहुत गुस्से में एक मुक्का मारा था इसलिए उसकी नाक बिलकुल भद्दी सी हो गयी थी। मगर मैडम को वो अपने सारे चमचों में सबसे ज्यादा पसंद था। मैडम ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा, और हलकी सी मुस्कान के साथ जाने अनजाने ही उनके मुँह से निकल गया, “तू कितना बदसूरत है रे डिक्की?” मैडम के ऐसा कहते ही डिक्की के गाल सुर्ख लाल हो गए। ऐसे वो अपने आप में सिमट गया जैसे कोई नयी नवेली शरमा जाये। और फिर बोला “मैडम, मैं केतुल बाबा के खूबसूरत चेहरे पर काला टीका हूँ, उनको हर बुरी नजर से बचाने के लिए।”

मैडम: “ठीक है, अच्छा पता करो ये कजरी अपना काम तो ठीक से कर रही है न? कभी कभी हमारे बारे में भी उल्टा-सीधा बोलती है।”

डिक्की: “वो उसकी रणनीति का हिस्सा है मैडम। मगर मुझे लगता है कि उस पर कुछ ज्यादा ही बड़ा दाँव खेल दिया हमने। कुछ खास रिटर्न्स नहीं आ रहे हैं।”

मैडम: “तो बंद करो उसकी फंडिंग आज से ही।”

“जी मैडम” डिक्की ये कह कर तुरंत फ़ोन पर किसी को आदेश देने लग गया।

आखिरी अध्याय

केतुल बाबा के ऑपरेशन को एक साल होने आया है। सर पर बाल पूरी तरह से वापस आ गए हैं। लेज़र से वैसे भी ऑपरेशन के सारे नामोनिशान मिट चुके है। ऑपरेशन बहुत ज्यादा कामयाब भी हुआ है। धीरे धीरे केतुल बाबा ने अपनी दिनचर्या में लौटना शुरू कर दिया है। मंदी परिवार के चंद अंदरूनी लोगों को छोड़ कर किसी को भी ऑपरेशन के बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। जिन लोगों की मंदी परिवार के पुराने उत्पादों से आज भी मीठी यादें संजी हैं, उनमे केतुल बाबा में धीरेन्द्र को खत्म करने की पूरी काबिलियत दिखाई देती है।

चूँकि मैडम अब बूढ़ी हो चलीं हैं, तो सारे चमचो ने मैडम को मना लिया है कि केतुल बाबा को मंदी कारोबार की पूरी जिम्मेदारी सौंप दी जाये। अब सारे फैसले केतुल बाबा ही लिया करेंगे। दरअसल आप समझ ही गए होंगे कि केतुल बाबा का तो सिर्फ नाम होगा, अब ये साम्राज्य चमचों के ही हाथ होगा।

इधर शुरुआती जोश और धूम के बाद कजरी की नाट्य मण्डली कुछ खास आगे बढ़ नहीं पा रही है। इसके दो कारण साफ़ दिखाई दे रहे हैं।

पहला, अपनी कला को बढ़ाने से ज्यादा धीरेन्द्र के स्टार्टअप पर अत्यधिक ध्यान। आम प्रशंसक इस बात से काफी चिढ़ रहे थे।

दूसरा, ज्यादा से ज्यादा प्रशंसक प्राप्त करने के फेर में अपने नृत्य में फूहड़ और अश्लील किस्म के कुछ नृत्य पद जोड़ देना। पढ़ा लिखा और सभ्य समाज इस बात पर कुपित था।

धीरे धीरे प्रशंसक कम हो रहे हैं, तो सिर्फ नृत्य के प्रोग्राम कर के इतना पैसा आ नहीं सकता है। मंदी परिवार से मिलने वाली फंडिंग बहुत पहले बंद हो चुकी है। कजरी की हताशा की कोई सीमा नहीं रही है।

कजरी की हताशा का ये आलम है कि वो अब रंगमंच के अलावा लोगों के निजी कार्यक्रमों में भी नृत्य करती है। मैं ऐसे किसी निजी कार्यक्रम में खुद नहीं गया हूँ इसलिए कह नहीं सकता की वहाँ क्या होता होगा मगर सोचता हूँ की कभी कभी अगर कोई धनाढ्य व्यक्ति किसी ‘खास आइटम’ की फरमाइश कर देता होगा तो क्या कजरी मना कर पाती होगी? आखिरकार इन्ही लोगों से तो उसकी मंडली चल रही है।

रोज़ रोज़ की जिल्लत अब कुछ ज्यादा हो रही थी कजरी के लिए। आज उसने फैसला कर ही लिया कि वो केतुल से मिलने जाएगी और पुराने प्यार का वास्ता देगी। क्या पता उसका दिल पिघल ही जाए। काश मैंने उस दिन व्हाट्सएप्प पर वो सब नहीं लिखा होता। काश की वो दिन एक बार फिर वापस आ जाए और मैं सब कुछ पहले जैसा कर दूँ। बस एक बार! बस एक बार केतुल मेरे को अपना ले! मैं केतुल को इतना प्यार दूँगी कि इस ज़माने में किसी ने किसी को नहीं दिया होगा।

मगर सच तो यही है कि दुनिया की तमाम धन सम्पदा दे कर भी आप गुजरा हुआ पल वापस नहीं ला सकते। अब तो कजरी को कल की मीटिंग के बारे में सोंचना है जो केतुल और डिक्की के साथ तय हुई है।

अगले दिन कजरी केतुल से मिलने पहुंची तो उसने देखा कि केतुल बाबा ने उसे पहचाना भी नहीं। पता है बहुत नाराज़ हो मुझसे। तुम्हारी नाराज़गी तो एक पल में ही दूर कर दूँगी। एक बार मेरी तरफ देखो तो।

बात की शुरुआत डिक्की ने की: “देखिये कजरी जी, आपको पैसे जिस काम के लिए दिए जा रहे थे, हमें उसका कोई फायदा नहीं हो रहा है। दर असल ये एक प्रयोग था जो सफल नहीं हुआ। अब हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते।”

कजरी डिक्की को नजर अंदाज करके केतुल की तरफ टकटकी लगा कर देखे जा रही है। केतुल कभी उसकी तरफ देख कर मुस्कुरा देता तो कभी कहीं और देखने लग जाता। समझ नहीं आ रहा है नाराज है या कजरी से छेड़खानी कर रहा है।

कजरी: “केतुल जी, जरा सुनिए। दर असल हमारी नृत्य मण्डली…”

केतुल को जैसे ही नृत्य शब्द सुनाई दिया वो चहक कर बोला, “तुम डांस करती हो ना? मुझे तुम्हे देख कर ऐसा ही लगा था। मुझे भी कर के दिखाओ ना प्लीज।”

डिक्की जैसे तलवे चाटने वाले डॉगी के लिए ये इशारा ही काफी था। उसने तुरंत सारा इंतजाम कर दिया और कजरी को नृत्य का इशारा दे डाला।

अगर मेरे पापों का ये प्रायश्चित है तो यही सही, कजरी ने एक खूबसूरत नृत्य पेश करना प्रारम्भ किया।

केतुल को ज्यादा मजा नहीं आ रहा है या उसका ध्यान कहीं और है। डिक्की को पता है कि केतुल का मस्तिष्क अब बहुत कम देर ही स्थिर रह पाता है, उसे शायद याद ही नहीं थोड़ी देर पहले उसने क्या कहा था।

पूरा नृत्य ख़तम होने के बाद केतुल का ध्यान अचानक कजरी पर आ गया, “क्या आप डांस करती हैं? कुछ दिखाइए न प्लीज?”

कजरी ठगी सी महसूस कर रही है। ये केतुल मेरे साथ मजाक कर रहे हैं क्या? इतने में डिक्की भौंक उठा (उफ़ माफ़ कीजियेगा, मेरा मतलब था कि बोल उठा), “कजरी तुम्हे एक प्रोग्राम और पेश करना होगा साहब को।”

कजरी भारी कदमों से चल चुकी है फिर से एक और प्रोग्राम पेश करने। केतुल का ध्यान फिर कहीं और चला गया है, और डिक्की मुफ्त में फिर से कजरी के नृत्य का आनंद लेने बैठ गया है। अगर कजरी और केतुल के प्रेम की त्रासदी इसमें न होती तो ये दृश्य बड़ा हास्यास्पद सा लगता।

मुझे लग रहा है इसी मोड़ पर कहानी की इति श्री कर देनी चाहिए।

क्योंकि अब पता नहीं, केतुल न जाने कितनी बार कजरी से नृत्य की फरमाइश करेगा, और हर बार कजरी को उसकी फरमाइश पूरी करनी पड़ेगी क्योंकि डिक्की का बूढा मन इसी बहाने अपनी जवानी की सारी कल्पनाओं को सामने साकार होते देखेगा। इस प्रेम कहानी का सुखद अंत होना संभव ही नहीं था। केतुल का मस्तिष्क करीब करीब खाली है ये बात कजरी को पता नहीं है, और मंदी कारोबार के लिए कजरी का कोई उपयोग नहीं रह गया है इसलिए कोई भी वहां कजरी की कोई मदद करेगा नहीं।

आखिरी समाचार मिलने तक कजरी रोज ही मंदी महल के चक्कर काट रही थी। मगर आप पाठकगण कजरी के भविष्य को ले कर दुखी मत होइएगा। मर्दों की बनाई इस दुनिया में कजरी अपना मुकाम हासिल करके ही रहेगी एक दिन।

01 मई

गँजहों के गाँव का लोकतंत्र – श्रीलाल शुक्ल

तहसील का मुख्यालय होने के बावजूद शिवपालगंज इतना बड़ा गाँव न था कि उसे टाउन एरिया होने का हक मिलता। शिवपालगंज में एक गाँव-सभा थी और गाँववाले उसे गाँव-सभा ही बनाए रखना चाहते थे ताकि उन्हें टाउन एरियावाली दर से ज्यादा टैक्स न देना पड़े। इस गाँव-सभा के प्रधान रामाधीन भीखमखेड़वी के भाई थे जिनकी सबसे बड़ी सुंदरता यह थी कि वे इतने साल प्रधान रह चुकने के बावजूद न तो पागलखाने गए थे, न जेलखाने। गँजहों में वे अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध थे और उसी कारण, प्रधान बनने के पहले तक, वे सर्वप्रिय थे। बाहर से अफसरों के आने पर गाँव वाले उनको एक प्रकार से तश्तरी रख कर उनके सामने पेश करते थे। और कभी-कभी कह भी देते थे कि साहेब, शहर में जो लोग चुन कर जाते हैं उन्हें तो तुमने हजार बार देखा होगा, अब एक बार यहाँ का भी माल देखते जाओ।

गाँव-सभा के चुनाव जनवरी के महीने में होने थे और नवंबर लग चुका था। सवाल यह था कि इस बार किस को प्रधान बनाया जाए? पिछले चुनावों में वैद्य जी ने कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि गाँव-सभा के काम को वे निहायत जलील काम मानते थे। और वह एक तरह से जलील था भी, क्योंकि गाँव-सभाओं के अफसर बड़े टुटपुँजिया क़िस्म के अफसर थे। न उनके पास पुलिस का डंडा था, न तहसीलदार का रुतबा, और उनसे रोज-रोज अपने काम का मुआयना करने में आदमी की इज्जत गिर जाती थी। प्रधान को गाँव-सभा की जमीन-जायदाद के लिए मुकदमे करने पड़ते थे और शहर के इजलास में वकीलों और हाकिमों का उनके साथ वैसा भी सलूक न था जो एक चोर का दूसरे चोर के साथ होता है। मुकदमेबाजी में दुनिया-भर की दुश्मनी लेनी पड़ती थी और मुसीबत के वक़्त पुलिसवाले सिर्फ मुस्करा देते थे उन्हें मोटे अक्षरों में ‘परधान जी’ कह कर थाने के बाहर का भूगोल समझाने लगते थे।

पर इधर कुछ दिनों से वैद्य जी की रुचि गाँव-सभा में भी दिखने लगी थी, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री का एक भाषण किसी अखबार में पढ़ लिया था। उस भाषण में बताया गया था कि गाँवों का उद्धार स्कूल, सहकारी समिति और गाँव-पंचायत के आधार पर ही हो सकता है और अचानक वैद्य जी को लगा कि वे अभी तक गाँव का उद्धार सिर्फ कोऑपरेटिव यूनियन और कॉलिज के सहारे करते आ रहे थे और उनके हाथ में गाँव-पंचायत तो है ही नहीं। “आह!” उन्होंने सोचा होगा, “तभी शिवपालगंज का ठीक से उद्धार नहीं हो रहा है। यही तो मैं कहूँ कि क्या बात है?”

रुचि लेते ही कई बातें सामने आईं। यह कि रामाधीन के भाई ने गाँव-सभा को चौपट कर दिया है। गाँव की बंजर जमीन पर लोगों ने मनमाने कब्जे कर लिए हैं और निश्चय ही प्रधान ने रिश्वत ली है। गाँव-पंचायत के पास रुपया नहीं है और निश्चय ही प्रधान ने गबन किया है। गाँव के भीतर बहुत गंदगी जमा हो गई है और प्रधान निश्चय ही सुअर का बच्चा है। थानेवालों ने प्रधान की शिकायत पर कई लोगों का चालान किया है जिससे सिर्फ यही नतीजा निकलता है कि वह अब पुलिस का दलाल हो गया है। प्रधान को बंदूक का लाइसेंस मिल गया है जो निश्चय ही डकैतियों के लिए उधार जाती है और पिछले साल गाँव में बजरंगी का कत्ल हुआ था, तो बूझो कि क्यों हुआ था?

भंग पीनेवालों में भंग पीसना एक कला है, कविता है, कार्रवाई है, करतब है, रस्म है। वैसे टके की पत्ती को चबा कर ऊपर से पानी पी लिया जाए तो अच्छा-खासा नशा आ जाएगा, पर यहाँ नशेबाजी सस्ती है। आदर्श यह है कि पत्ती के साथ बादाम, पिस्ता, गुलकंद दूध-मलाई आदि का प्रयोग किया जाए। भंग को इतना पीसा जाए कि लोढ़ा और सिल चिपक कर एक हो जाएँ, पीने के पहले शंकर भगवान की तारीफ में छंद सुनाए जाएँ और पूरी कार्रवाई को व्यक्तिगत न बना कर उसे सामूहिक रूप दिया जाए।

सनीचर का काम वैद्य जी की बैठक में भंग के इसी सामाजिक पहलू को उभारना था। इस समय भी वह रोज की तरह भंग पीस रहा था। उसे किसी ने पुकारा, “सनीचर!” सनीचर ने फुँफकार कर फन-जैसा सिर ऊपर उठाया। वैद्य जी ने कहा, “भंग का काम किसी और को दे दो और यहाँ अंदर आ जाओ।”

जैसे कोई उसे मिनिस्टरी से इस्तीफा देने को कह रहा हो। वह भुनभुनाने लगा, “किसे दे दें? कोई है इस काम को करनेवाला? आजकल के लौंडे क्या जानें इन बातों को। हल्दी-मिर्च जैसा पीस कर रख देंगे।” पर उसने किया यही कि सिल-लोढ़े का चार्ज एक नौजवान को दे दिया, हाथ धो कर अपने अंडरवियर के पीछे पोंछ लिए और वैद्य जी के पास आ कर खड़ा हो गया।

तख्त पर वैद्य जी, रंगनाथ, बद्री पहलवान और प्रिंसिपल साहब बैठे थे। प्रिंसिपल एक कोने में खिसक कर बोले, “बैठ जाइए सनीचर जी!”

इस बात ने सनीचर को चौकन्ना कर दिया। परिणाम यहाँ हुआ कि उसने टूटे हुए दाँत बाहर निकाल कर छाती के बाल खुजलाने शुरू कर दिए। वह बेवकूफ-सा दिखने लगा, क्योंकि वह जानता था चालाकी के हमले का मुकाबला किस तरह किया जाता है। बोला, “अरे प्रिंसिपल साहेब, अब अपने बराबर बैठा कर मुझे नरक में न डालिए।”

बद्री पहलवान हँसे। बोले, “स्साले! गँजहापन झाड़ते हो! प्रिंसिपल साहब के साथ बैठने से नरक में चले जाओगे?” फिर आवाज बदल कर बोले, “बैठ जाओ उधर।”

वैद्य जी ने शाश्वत सत्य कहने वाली शैली में कहा, “इस तरह से न बोलो बद्री। मंगलदास जी क्या होने जा रहे हैं, इसका तुम्हें कुछ पता भी है?”

सनीचर ने बरसों बाद अपना सही नाम सुना था। वह बैठ गया और बड़प्पन के साथ बोला, “अब पहलवान को ज्यादा जलील न करो महाराज। अभी इनकी उमर ही क्या है? वक़्त पर सब समझ जाएँगे।”

वैद्य जी ने कहा, “तो प्रिंसिपल साहब, कह डालो जो कहना है।”

उन्होंने अवधी में कहना शुरू किया, “कहै का कउनो बात है? आप लोग सब जनतै ही हो।” फिर अपने को खड़ीबोली की सूली पर चढ़ा कर बोले, “गाँव-सभा का चुनाव हो रहा है, यहाँ का प्रधान बड़ा आदमी होता है। वह कॉलिज-कमेटी का मेंबर भी होता है – एक तरह से मेरा भी अफ़सर।”

वैद्य जी ने अकस्मात कहा, “सुनो मंगलदास, इस बार हम लोग गाँव-सभा का प्रधान तुम्हें बनाएँगे।”

सनीचर का चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा होने लगा। उसने हाथ जोड़ दिए – पुलक गात लोचन सलिल। किसी गुप्त रोग से पीड़ित, उपेक्षित कार्यकर्ता के पास किसी मेडिकल असोसिएशन का चेयरमैन बनने का परवाना आ जाए तो उसकी क्या हालत होगी? वही सनीचर की हुई। फिर अपने को काबू में करके उसने कहा, “अरे नहीं महाराज, मुझ जैसे नालायक को आपने इस लायक समझा, इतना बहुत है। पर मैं इस इज्जत के काबिल नहीं हूँ।”

सनीचर को अचंभा हुआ कि अचानक वह कितनी बढ़िया उर्दू छाँट गया है। पर बद्री पहलवान ने कहा, “अबे, अभी से मत बहक। ऐसी बातें तो लोग प्रधान बनने के बाद कहते हैं। इन्हें तब तक के लिए बाँधे रख।”

इतनी देर बाद रंगनाथ बातचीत में बैठा। सनीचर का कंधा थपथपा कर उसने कहा, “लायक-नालायक की बात नहीं है सनीचर! हम मानते हैं कि तुम नालायक हो पर उससे क्या? प्रधान तुम खुद थोड़े ही बन रहे हो। वह तो तुम्हें जनता बना रही है। जनता जो चाहेगी, करेगी। तुम कौन हो बोलनेवाले?”

पहलवान ने कहा, “लौंडे तुम्हें दिन-रात बेवकूफ बनाते रहते हैं। तब तुम क्या करते हो? यही न कि चुपचाप बेवकूफ बन जाते हो?”

प्रिंसिपल साहब ने पढ़े-लिखे आदमी की तरह समझाते हुए कहा, “हाँ भाई, प्रजातंत्र है। इसमें तो सब जगह इसी तरह होता है।” सनीचर को जोश दिलाते हुए वे बोले, “शाबाश, सनीचर, हो जाओ तैयार!” यह कह कर उन्होंने ‘चढ़ जा बेटा सूली पर’ वाले अंदाज से सनीचर की ओर देखा। उसका सिर हिलना बंद हो गया था।

प्रिंसिपल ने आखिरी धक्का दिया, “प्रधान कोई गबड़ू-घुसड़ू ही हो सकता है। भारी ओहदा है। पूरे गाँव की जायदाद का मालिक! चाहे तो सारे गाँव को 107 में चालान करके बंद कर दे। बड़े-बड़े अफ़सर आ कर उसके दरवाजे बैठते हैं! जिसकी चुगली खा दे, उसका बैठना मुश्किल। कागज पर जरा-सी मोहर मार दी और जब चाहा, मनमाना तेल-शक्कर निकाल लिया। गाँव में उसके हुकुम के बिना कोई अपने घूरे पर कूड़ा तक नहीं डाल सकता। सब उससे सलाह ले कर चलते हैं। सब की कुंजी उसके पास है। हर लावारिस का वही वारिस है। क्या समझे?”

रंगनाथ को ये बातें आदर्शवाद से कुछ गिरी हुई जान पड़ रही थीं। उसने कहा, “तुम तो मास्टर साहब, प्रधान को पूरा डाकू बनाए दे रहे हो।”

“हें-हें-हें” कह कर प्रिंसिपल ने ऐसा प्रकट किया जैसे वे जान-बूझ कर ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हों। यह उनका ढंग था, जिसके द्वारा बेवकूफी करते-करते वे अपने श्रोताओं को यह भी जता देते थे कि मैं अपनी बेवकूफी से परिचित हूँ और इसलिए बेवकूफ नहीं हूँ।

“हें-हें-हें, रंगनाथ बाबू! आपने भी क्या सोच लिया? मैं तो मौजूदा प्रधान की बातें बता रहा था।”

रंगनाथ ने प्रिंसिपल को गौर से देखा। यह आदमी अपनी बेवकूफी को भी अपने दुश्मन के ऊपर ठोंक कर उसे बदनाम कर रहा है। समझदारी के हथियार से तो अपने विरोधियों को सभी मारते हैं, पर यहाँ बेवकूफी के हथियार से विरोधी को उखाड़ा जा रहा है। थोड़ी देर के लिए खन्ना मास्टर और उनके साथियों के बारे में वह निराश हो गया। उसने समझ लिया कि प्रिंसिपल का मुक़ाबला करने के लिए कुछ और मँजे हुए खिलाड़ी की जरूरत है। सनिचर कह रहा था, “पर बद्री भैया, इतने बड़े-बड़े हाकिम प्रधान के दरवाज़े पर आते हैं… अपना तो कोई दरवाजा ही नहीं है; देख तो रहे हो वह टुटहा छप्पर!”

बद्री पहलवान हमेशा से सनीचर से अधिक बातें करने में अपनी तौहीन समझते थे। उन्हें संदेह हुआ कि आज मौका पा कर यहाँ मुँह लगा जा रहा है। इसलिए वे उठ कर खड़े हो गए। कमर से गिरती हुई लुंगी को चारों ओर से लपेटते हुए बोले, “घबराओ नहीं। एक दियासलाई तुम्हारे टुटहे छप्पर में भी लगाए देता हूँ। यह चिंता अभी दूर हुई जाती है।”

कह कर वे घर के अंदर चले गए। यह मजाक था, ऐसा समझ कर पहले प्रिंसिपल साहब हँसे, फिर सनीचर भी हँसा। रंगनाथ की समझ में आते-आते बात दूसरी ओर चली गई थी। वैद्य जी ने कहा, “क्यों? मेरा स्थान तो है ही। आनंद से यहाँ बैठे रहना। सभी अधिकारियों का यहीं से स्वागत करना। कुछ दिन बाद पक्का पंचायतघर बन जायेगा तो उसी में जा कर रहना। वहीं से गाँव-सभा की सेवा करना।”

सनीचर ने फिर विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़े। सिर्फ़ यही कहा, “मुझे क्या करना है? सारी दुनिया यही कहेगी कि आप लोगों के होते हुए शिवपालगंज में एक निठल्ले को…”

प्रिंसिपल ने अपनी चिर-परिचित “हें-हें-हें” और अवधी का प्रयोग करते हुए कहा, “फिर बहकने लगे आप सनीचर जी! हमारे इधर राजापर की गाँव-सभा में वहाँ के बाबू साहब ने अपने हलवाहे को प्रधान बनाया है। कोई बड़ा आदमी इस धकापेल में खुद कहाँ पड़ता है।”

प्रिंसिपल साहब बिना किसी कुंठा के कहते रहे, “और मैनेजर साहब, उसी हलवाहे ने सभापति बन कर रंग बाँध दिया। किस्सा मशहूर है कि एक बार तहसील में जलसा हुआ। डिप्टी साहब आए थे। सभी प्रधान बैठे थे। उन्हें फर्श पर दरी बिछा कर बैठाया गया था। डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठे थे। तभी हलवाहेराम ने कहा कि यह कहाँ का न्याय है कि हमें बुला कर फर्श पर बैठाया जाए और डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठें। डिप्टी साहब भी नए लौंडे थे। ऐंठ गए। फिर तो दोनों तरफ़ इज्जत का मामला पड़ गया। प्रधान लोग हलवाहेराम के साथ हो गए। “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगने लगे। डिप्टी साहब वहीं कुर्सी दबाए “शांति-शांति” चिल्लाते रहे। पर कहाँ की शांति और कहाँ की शकुंतला? प्रधानों ने सभा में बैठने से इनकार कर दिया और राजापुर का हलवाहा तहसीली क्षेत्र का नेता बन बैठा। दूसरे ही दिन तीन पार्टियों ने अर्जी भेजी कि हमारे मेंबर बन जाओ पर बाबू साहब ने मना कर दिया कि “खबरदार, अभी कुछ नहीं। हम जब जिस पार्टी को बताएँ, उसी के मेंबर बन जाना।”

सनीचर के कानों में “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लग रहे थे। उसकी कल्पना में एक नग-धड़ंग अंडरवियर-धारी आदमी के पीछे सौ-दो सौ आदमी बाँह उठा-उठा कर चीख रहे थे। वैद्य जी बोले, “यह अशिष्टता थी। मैं प्रधान होता तो उठ कर चला आता। फिर दो मास बाद अपनी गाँव-सभा में उत्सव करता। डिप्टी साहब को भी आमंत्रित करता। उन्हें फर्श पर बैठा देता। उसके बाद स्वयं कुर्सी पर बैठ कर व्याख्य़ान देते हुए कहता कि बंधुओ! मुझे कुर्सी पर बैठने में स्वाभाविक कष्ट है, पर अतिथि-सत्कार का यह नियम डिप्टी साहब ने अमुक तिथि को हमें तहसील में बुला कर सिखाया था। अत: उनकी शिक्षा के आधार पर मुझे इस असुविधा को स्वीकार करना पड़ा है।” कह कर वैद्य जी आत्मतोष के साथ ठठा कर हँसे। रंगनाथ का समर्थन पाने के लिए बोले, “क्यों बेटा, यही उचित होता न?”

रंगनाथ ने कहा, “ठीक है। मुझे भी यह तरकीब लोमड़ी और सारस की कथा में समझाई गई थी।”

वैद्य जी ने सनीचर से कहा, “तो ठीक है। जाओ देखो, कहीं सचमुच ही तो उस मूर्ख ने भंग को हल्दी-जैसा नहीं पीस दिया है। जाओ, तुम्हारा हाथ लगे बिना रंग नहीं आता।”

बद्री पहलवान मुस्करा कर दरवाजे पर से बोला, “जाओ साले, फिर वही भंग घोंटो!”

श्रीलाल शुक्ल
(‘राग दरबारी’ का एक अंश)

01 मई

भेड़ें और भेड़िये – हरिशंकर परसाई

एक बार एक वन के पशुओं को ऐसा लगा कि वे सभ्यता के उस स्तर पर पहुँच गए हैं, जहाँ उन्हें एक अच्छी शासन-व्यवस्था अपनानी चाहिए। और,एक मत से यह तय हो गया कि वन-प्रदेश में प्रजातंत्र की स्थापना हो। पशु-समाज में इस `क्रांतिकारी’ परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गयी कि सुख-समृद्धि और सुरक्षा का स्वर्ण-युग अब आया।

जिस वन-प्रदेश में हमारी कहानी ने चरण धरे हैं, उसमें भेंडें बहुत थीं – निहायत नेक , ईमानदार, दयालु , निर्दोष पशु जो घास तक को फूँक-फूँक कर खाता है।

भेड़ों ने सोचा कि अब हमारा भय दूर हो जाएगा। हम अपने प्रतिनिधियों से क़ानून बनवाएँगे कि कोई जीवधारी किसी को न सताए, न मारे। सब जिएँ और जीने दें। शान्ति, स्नेह, बन्धुत्त्व और सहयोग पर समाज आधारित हो।

इधर, भेड़ियों ने सोचा कि हमारा अब संकटकाल आया। भेड़ों की संख्या इतनी अधिक है कि पंचायत में उनका बहुमत होगा और अगर उन्होंने क़ानून बना दिया कि कोई पशु किसी को न मारे, तो हम खायेंगे क्या? क्या हमें घास चरना सीखना पडेगा?

ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ों का उल्लास बढ़ता जाता।

ज्यों-ज्यों चुनाव समीप आता, भेड़ियों का दिल बैठता जाता।

एक दिन बूढ़े सियार ने भेड़िये से कहा,“मालिक, आजकल आप बड़े उदास रहते हैं।”

हर भेड़िये के आसपास दो – चार सियार रहते ही हैं। जब भेड़िया अपना शिकार खा लेता है, तब ये सियार हड्डियों में लगे माँस को कुतरकर खाते हैं, और हड्डियाँ चूसते रहते हैं। ये भेड़िये के आसपास दुम हिलाते चलते हैं, उसकी सेवा करते हैं और मौके-बेमौके “हुआँ-हुआँ” चिल्लाकर उसकी जय बोलते हैं।

तो बूढ़े सियार ने बड़ी गंभीरता से पूछा, “महाराज, आपके मुखचंद्र पर चिंता के मेघ क्यों छाये हैं?” वह सियार कुछ कविता भी करना जानता होगा या शायद दूसरे की उक्ति को अपना बनाकर कहता हो।

ख़ैर, भेड़िये ने कहा, “तुझे क्या मालूम नहीं है कि वन-प्रदेश में नई सरकार बनने वाली है? हमारा राज्य तो अब गया।”

सियार ने दांत निपोरकर कहा, “हम क्या जानें महाराज! हमारे तो आप ही `माई-बाप’ हैं। हम तो कोई और सरकार नहीं जानते। आपका दिया खाते हैं, आपके गुण गाते हैं।”

भेड़िये ने कहा, “मगर अब समय ऐसा आ रहा है कि सूखी हड्डियाँ भी चबाने को नहीं मिलेंगी।”

सियार सब जानता था, मगर जानकार भी न जानने का नाटक करना न आता, तो सियार शेर न हो गया होता!

आखिर भेड़िये ने वन-प्रदेश की पंचायत के चुनाव की बात बूढ़े सियार को समझाई और बड़े गिरे मन से कहा, “चुनाव अब पास आता जा रहा है। अब यहाँ से भागने के सिवा कोई चारा नहीं। पर जाएँ भी कहाँ?”

सियार ने कहा, “मालिक, सर्कस में भरती हो जाइए।”

भेड़िये ने कहा, “अरे, वहाँ भी शेर और रीछ को तो ले लेते हैं, पर हम इतने बदनाम हैं कि हमें वहाँ भी कोई नहीं पूछता।”

“तो,” सियार ने खूब सोचकर कहा, “अजायबघर में चले जाइए।”

भेड़िये ने कहा, “अरे, वहाँ भी जगह नहीं है, सुना है। वहाँ तो आदमी रखे जाने लगे हैं।”

बूढा सियार अब ध्यानमग्न हो गया। उसने एक आँख बंद की, नीचे के होंठ को ऊपर के दाँत से दबाया और एकटक आकाश की और देखने लगा जैसे विश्वात्मा से कनेक्शन जोड़ रहा हो। फिर बोला,“बस सब समझ में आ गया। मालिक, अगर पंचायत में आप भेड़िया जाति का बहुमत हो जाए तो?”

भेड़िया चिढ़कर बोला, “कहाँ की आसमानी बातें करता है? अरे हमारी जाति कुल दस फीसदी है और भेड़ें तथा अन्य पशु नब्बे फीसदी। भला वे हमें काहे को चुनेंगे। अरे, कहीं ज़िंदगी अपने को मौत के हाथ सौंप सकती है? मगर हाँ, ऐसा हो सकता तो क्या बात थी!”

बूढा सियार बोला, “आप खिन्न मत होइए सरकार! एक दिन का समय दीजिए। कल तक कोई योजना बन ही जायेगी। मगर एक बात है। आपको मेरे कहे अनुसार कार्य करना पड़ेगा।”

मुसीबत में फँसे भेड़िये ने आखिर सियार को अपना गुरु माना और आज्ञापालन की शपथ ली।

दूसरे दिन बूढा सियार अपने तीन सियारों को लेकर आया। उनमें से एक को पीले रंग में रंग दिया था, दूसरे को नीले में, और तीसरे को हरे में।

भेड़िये ने देखा और पूछा, “अरे ये कौन हैं?

बूढा सियार बोला, “ये भी सियार हैं सरकार, मगर रंगे सियार हैं। आपकी सेवा करेंगे। आपके चुनाव का प्रचार करेंगे।”

भेड़िये ने शंका की, “मगर इनकी बात मानेगा कौन? ये तो वैसे ही छल-कपट के लिए बदनाम हैं।”

सियार ने भेड़िये का हाथ चूमकर कहा, “बड़े भोले हैं आप सरकार! अरे मालिक, रूप-रंग बदल देने से तो सुना है आदमी तक बदल जाते हैं। फिर ये तो सियार हैं।”

और तब बूढ़े सियार ने भेड़िये का भी रूप बदला। मस्तक पर तिलक लगाया, गले में कंठी पहनाई और मुँह में घास के तिनके खोंस दिए। बोला, “अब आप पूरे संत हो गए। अब भेड़ों की सभा में चलेंगे। मगर तीन बातों का ख्याल रखना – अपनी हिंसक आँखों को ऊपर मत उठाना, हमेशा ज़मीन की ओर देखना और कुछ बोलना मत, नहीं तो सब पोल खुल जायेगी, और वहाँ बहुत-सी भेड़ें आयेंगी, सुन्दर-सुन्दर, मुलायम-मुलायम, तो कहीं किसी को तोड़ मत खाना।”

भेड़िये ने पूछा, “लेकिन रंगे सियार क्या करेंगे? ये किस काम आयेंगे?”

बूढ़ा सियार बोला, “ये बड़े काम के हैं। आपका सारा प्रचार तो यही करेंगे। इन्हीं के बल पर आप चुनाव लड़ेंगे। यह पीला वाला सियार बड़ा विद्वान है, विचारक है, कवि भी है, और लेखक भी। यह नीला सियार पत्रकार है। और यह हरा धर्मगुरु। बस, अब चलिए।”

“ज़रा ठहरो,” भेड़िये ने बूढ़े सियार को रोका, “कवि, लेखक, नेता, विचारक – ये तो सुना है बड़े अच्छे लोग होते हैं। और ये तीनों…”

बात काटकर सियार बोला, “ये तीनों सच्चे नहीं हैं, रंगे हुए हैं महाराज! अब चलिए देर मत करिए।”

और वे चल दिए। आगे बूढा सियार था, उसके पीछे रंगे सियारों के बीच भेड़िया चल रहा था – मस्तक पर तिलक, गले में कंठी, मुख में घास के तिनके। धीरे-धीरे चल रहा था, अत्यंत गंभीरतापूर्वक, सर झुकाए विनय की मूर्ति!

उधर एक स्थान पर सहस्रों भेंड़ें इकट्ठी हो गईं थीं, उस संत के दर्शन के लिए, जिसकी चर्चा बूढ़े सियार ने फैला रखी थी।

चारों सियार भेड़िये की जय बोले हुए भेड़ों के झुण्ड के पास आए। बूढ़े सियार ने एक बार जोर से संत भेड़िये की जय बोली! भेड़ों में पहले से ही यहाँ-वहाँ बैठे सियारों ने भी जयध्वनि की।

भेड़ों ने देखा तो वे बोलीं, “अरे भागो, यह तो भेड़िया है।”

तुरंत बूढ़े सियार ने उन्हें रोककर कहा, “भाइयों और बहनों! अब भय मत करो। भेड़िया राजा संत हो गए हैं। उन्होंने हिंसा बिलकुल छोड़ दी है। उनका हृदय परिवर्तन हो गया है। वे आज सात दिनों से घास खा रहे हैं। रात-दिन भगवान के भजन और परोपकार में लगे रहते हैं। उन्होंने अपना जीवन जीव-मात्र की सेवा में अर्पित कर दिया है। अब वे किसी का दिल नहीं दुखाते, किसी का रोम तक नहीं छूते। भेड़ों से उन्हें विशेष प्रेम है। इस जाति ने जो कष्ट सहे हैं, उनकी याद करके कभी-कभी भेड़िया संत की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उनकी अपनी भेड़िया जाति ने जो अत्याचार आप पर किये हैं उनके कारण भेड़िया संत का माथा लज्जा से जो झुका है, सो झुका ही हुआ है। परन्तु अब वे शेष जीवन आपकी सेवा में लगाकर तमाम पापों का प्रायश्चित्त करेंगे। आज सवेरे की ही बात है कि एक मासूम भेड़ के बच्चे के पाँव में काँटा लग गया, तो भेड़िया संत ने उसे दाँतों से निकाला, दाँतों से! पर जब वह बेचारा कष्ट से चल बसा, तो भेदिया संत ने सम्मानपूर्वक उसकी अंत्येष्टि-क्रिया की। उनके घर के पास जो हड्डियों का ढेर लगा है, उसके दान की घोषणा उन्होंने आज सवेरे ही की। अब तो वह सर्वस्व त्याग चुके हैं। अब आप उनसे भय मत करें। उन्हें अपना भाई समझें। बोलो सब मिलकर, संत भेड़िया जी की जय !”

भेड़िया जी अभी तक उसी तरह गर्दन डाले विनय की मूर्ती बने बैठे थे। बीच में कभी-कभी सामने की ओर इकट्ठी भेड़ों को देख लेते और टपकती हुई लार को गुटक जाते।

बूढा सियार फिर बोला, “भाइयों और बहनों, में भेड़िया संत से अपने मुखारविंद से आपको प्रेम और दया का सन्देश देने की प्रार्थना करता पर प्रेमवश उनका हृदय भर आया है, वह गदगद हो गए हैं और भावातिरेक से उनका कंठ अवरुद्ध हो गया है। वे बोल नहीं सकते। अब आप इन तीनों रंगीन प्राणियों को देखिये। आप इन्हें न पहचान पाए होंगे। पहचानें भी कैसे? ये इस लोक के जीव तो हैं नहीं। ये तो स्वर्ग के देवता हैं जो हमें सदुपदेश देने के लिए पृथ्वी पर उतरे हैं। ये पीले विचारक हैं, कवि हैं, लेखक हैं। नीले नेता हैं और स्वर्ग के पत्रकार हैं, और हरे वाले धर्मगुरु हैं। अब कविराज आपको स्वर्ग-संगीत सुनायेंगे। हाँ कवि जी …”

पीले सियार को ‘हुआं-हुआँ’ के सिवा कुछ और तो आता ही नहीं था। ‘हुआं-हुआँ’ चिल्ला दिया। शेष सियार भी ‘हुआं-हुआँ’ बोल पड़े। बूढ़े सियार ने आँख के इशारे से शेष सियारों को मना कर दिया और चतुराई से बात को यों कहकर सँभाला, “भई कवि जी तो कोरस में गीत गाते हैं। पर कुछ समझे आप लोग? कैसे समझ सकते हैं? अरे, कवि की बात सबकी समझ में आ जाए तो वह कवि काहे का? उनकी कविता से शाश्वत के स्वर फूट रहे हैं। वे कह रहे हैं की जैसे स्वर्ग में परमात्मा वैसे ही पृथ्वी पर भेड़िया। हे भेड़िया जी, महान! आप सर्वत्र व्याप्त हैं, सर्वशक्तिमान हैं। प्रातः आपके मस्तक पर तिलक करती है, साँझ को उषा आपका मुख चूमती है, पवन आप पर पंखा करता है और रात्रि को आपकी ही ज्योति लक्ष-लक्ष खंड होकर आकाश में तारे बनकर चमकती है। हे विराट! आपके चरणों में इस क्षुद्र का प्रणाम है।”

फिर नीले रंग के सियार ने कहा, “निर्बलों की रक्षा बलवान ही कर सकते हैं। भेड़ें कोमल हैं, निर्बल हैं, अपनी रक्षा नहीं कर सकतीं। भेड़िये बलवान हैं, इसलिए उनके हाथों में अपने हितों को छोड़ निश्चिन्त हो जाओ, वे भी तुम्हारे भाई हैं। आप एक ही जाति के हो। तुम भेड़ वह भेड़िया। कितना कम अंतर है ! और बेचारा भेड़िया व्यर्थ ही बदनाम कर दिया गया है कि वह भेड़ों को खाता है। अरे खाते और हैं, हड्डियां उनके द्वार पर फेंक जाते हैं। ये व्यर्थ बदनाम होते हैं। तुम लोग तो पंचायत में बोल भी नहीं पाओगे। भेड़िये बलवान होते हैं। यदि तुम पर कोई अन्याय होगा, तो डटकर लड़ेंगे। इसलिए अपने हित की रक्षा के लिए भेडियों को चुनकर पंचायत में भेजो। बोलो संत भेड़िया की जय !”

फिर हरे रंग के धर्मगुरु ने उपदेश दिया, “जो यहाँ त्याग करेगा, वह उस लोक में पाएगा। जो यहाँ दुःख भोगेगा, वह वहाँ सुख पाएगा। जो यहाँ राजा बनाएगा, वह वहाँ राजा बनेगा। जो यहाँ वोट देगा, वह वहाँ वोट पाएगा। इसलिए सब मिलकर भेड़िये को वोट दो। वे दानी हैं, परोपकारी हैं, संत हैं। में उनको प्रणाम करता हूँ।”

यह एक भेड़िये की कथा नहीं है, सब भेड़ियों की कथा है। सब जगह इस प्रकार प्रचार हो गया और भेड़ों को विश्वास हो गया कि भेड़िये से बड़ा उनका कोई हित-चिन्तक और हित-रक्षक नहीं है।

और, जब पंचायत का चुनाव हुआ तो भेड़ों ने अपने हित- रक्षा के लिए भेड़िये को चुना। और, पंचायत में भेड़ों के हितों की रक्षा के लिए भेड़िये प्रतिनिधि बनकर गए। और पंचायत में भेड़ियों ने भेड़ों की भलाई के लिए पहला कानून यह बनाया – हर भेड़िये को सवेरे नाश्ते के लिए भेड़ का एक मुलायम बच्चा दिया जाए, दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ तथा शाम को स्वास्थ्य के ख्याल से कम खाना चाहिए, इसलिए आधी भेड़ दी जाए।

हरिशंकर परसाई