06 अप्रैल

ग्रीष्म-अंक: ‘सृजन’ का नॉस्टाल्जिआपा

‘सृजन’ के इस नए रूप का प्रथम अंक आप सभी को सविनय प्रस्तुत है। इसकी भूमिका लिखने का प्रयास पिछले दिनों में कई बार किया, परन्तु स्वयं को नितांत अक्षम पाया। भावों के कई तंतु हैं, बहुत सोचा कि कैसे उनकी एक डोर बनाकर आपको उसमें लपेट लूँ, कैसे शुरुआत करूँ, लेकिन कुछ भी जँचा नहीं, हर प्रयास में एक अधूरापन सा लगा। फिर स्मरण आया कि मौन भी एक अभिव्यक्ति है, और न कह पाने की यह स्वीकारोक्ति भी एक कथन है। न कह पाना केवल मेरा ही अनुभव नहीं है, आपके साथ भी कभी न कभी हुआ ही होगा। तो उम्मीद है कि आप समझ जाएँगे।

आई. आई. टी. कानपुर में बी. टेक. की पढ़ाई के प्रथम वर्ष में ‘सृजन’ नाम की हिन्दी मासिक भित्ति-पत्रिका से परिचय हुआ। कई छात्रों की तरह मैं भी बारहवीं कक्षा तक हिंदी माध्यम में पढ़ा था; विज्ञान और गणित, सब कुछ हिन्दी में। अभी भी गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान के कई तकनीकी शब्द मेरे दिमाग में पहले हिन्दी में आते है। अब जब मैं वहाँ पुस्तकालय में बिताए अपने सीमित समय को याद करता हूँ, तो पाता हूँ कि वह अधिकांश हिन्दी पुस्तकों की अलमारियों के बीच गुजरा। हिन्दी की जितनी कहानियाँ, उपन्यास, कविताएँ उन चार सालों में पढ़ीं, उतनी न उसके पहले पढ़ीं और न बाद में। पढ़ाई-लिखाई, मस्ती और बदमाशी के बीच पुस्तकालय के सूचना-पट पर लगे ‘सृजन’ के पन्नों को पढ़ना पसंदीदा शगल हो गया। हर महीने इंतज़ार रहता था। आखिर आत्मा मातृभाषा में ही बोलती-समझती है।

दूसरे वर्ष में ‘सृजन’ प्रकाशन की जिम्मेदारी अश्विनी ने ले ली, मैं और कई अन्य मित्र इसमें सहयोगी थे। सहपाठियों से रचनाएँ इकट्ठा करते थे, कागज पर अपने सुन्दर हस्तलेख से लिखते थे, और पुस्तकालय के सूचना पटल पर लगाते थे। कुछ अपरिहार्य कारणों से अंतिम वर्ष में यह पत्रिका बंद हो गयी। हम सभी अपने जीवन के अगले पड़ाव की तैयारी में व्यस्त हो गए। जब आई. आई. टी. से निकले तो हम सब अपनी जिंदगी में डूब गए। पहले अपने काम और आजीविका की सरपट दौड़, और फिर साथ में विवाह और बच्चों की जिम्मेदारियाँ। वक्त की कैद में सभी की जिंदगी है, मगर जो चंद आजाद घड़ियाँ मिलीं बस उनमें ही हिन्दी साहित्य को पढ़ना या लिखना हो पाया।

इस सब के बीच ‘सृजन’ की स्मृति पता नहीं कैसे जीवित रही। ठीक चार हफ्ते पहले हम ‘सृजन’ के चाहने वालों के बीच यह बात चली कि सृजन को फिर से शुरू करना चाहिए। अश्विनी ने कहा कि चैत्र प्रतिपदा पर नव संवत्सर के शुभ अवसर पर ‘सृजन’ का पुनस्र्त्थान हो, प्रथम अंक निकले। समय बहुत कम था, और साथ ही वित्तीय वर्ष का आखिरी मास भी था, लेकिन फिर भी “शुभस्य शीघ्रम्” और “काल करे सो आज कर” के भाव से लग गए। पहला कदम चाहे जितना ही छोटा क्यों न हो, यात्रा का शुभारम्भ उसी से होता है। पिछले चौबीस सालों में बहुत कुछ बदल गया है। इंटरनेट और यूनिकोड ने हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के साहित्य को सुलभ कराया है, और प्रकाशन सरल हुआ है, और तकनीकी ने पाठकों तक पहुँचना सुगम कर दिया है। लेकिन साथ ही, हम सभी को लिखने का उतना अभ्यास नहीं रहा है, और सभी काफी व्यस्त भी हैं। इस सब के बावजूद, प्रस्तावित समय-सीमा में हम आरंभिक अंक निकालने में सफल हुए हैं।

भविष्य में यह पत्रिका किस मुकाम पर पहुँचेगी, वृक्ष कैसा होगा, कौन से फूल-फल लगेंगे, यह हमारा प्रयास निर्धारित करेगा। लेकिन इसका बीज कहाँ से आया, यह इस अंक की विषयवस्तु है। यह अंक अतीत और आगत के बीच की कड़ी है, इसीलिए हमने इसे नॉस्टाल्जिआपा कहा है।

आशा है आपको हमारा प्रयास पसंद आएगा, और आप इसके प्रकाशन और प्रसार में सहयोगी होंगे।

प्रोत्साहन एवं सहभागिता की आशा के साथ,
आपका,
सतीश चन्द्र गुप्त
चैत्र प्रतिपदा, संवत 2076
(6 अप्रैल 2019)

अनुक्रमणिका

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