06 अप्रैल

आई. आई. टी. कानपुर में ‘सृजन’

आई. आई. टी. कानपुर में प्रवेश को लेकर एक शायद थोड़ा भय-मिश्रित आनंद मेरे मन में शुरुआती दिनों में था। प्रवेश के बाद हम सभी को अंग्रेज़ी के एक टेस्ट से होकर गुजरना था। मैंने भी परीक्षा दी और खालिस हिंदी भाषी और हिंदी भक्त होने के बावजूद पास हो गया। मेरे जो मित्र चाहे आलस के कारण या अन्य किसी कारण से पास नहीं हो पाए, उन्हें पहले सेमेस्टर में ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंस के अंतर्गत अंग्रेजी का कोर्स लेना पड़ा। उस कोर्स की परीक्षा पास करने के बाद वे भी अंग्रेजी के सर्टिफाइड जानकार बन गए। वैसे जब लेक्चर शुरू हुए तो हर प्रोफेसर के अंग्रेजी बोलने का अपना एक अलग ही अंदाज देखने को मिला और मैंने महसूस किया कि यह जगह पराई है और वाकई मैंने अपने आपको ‘आउट ऑफ प्लेस’ जैसा पाया । 

ऐसे संक्रमण काल में जिन दो चीज़ों ने मेरा उत्साहवर्धन किया वे थे — लाइब्रेरी का समृद्ध हिंदी/संस्कृत पुस्तकों का संग्रह और लाइब्रेरी में ही नोटिस बोर्ड पर हर महीने चस्पा की जाती भित्ति-पत्रिका ‘सृजन’। भले ही सृजन हाथ से लिखी हुई पाँच-सात पन्नों की एक साहित्यिक भित्ति-पत्रिका रही हो, पर वो शायद मेरे जैसे कई हिंदी पृष्ठभूमि वाले छात्रों के लिए और मेरे जैसों की कल्पना से परे आई. आई. टी. कानपुर में एक अपनेपन का एहसास दिलाती थी।

मैं और मेरे जैसे कई अन्य लोग भी इस भित्ति-पत्रिका के नए अंक के आने का इंतज़ार किया करते थे जो लगभग हर महीने लाइब्रेरी की नोटिस बोर्ड पर कहीं से भी आ जाया करती थी । हमें उसे बार-बार पढ़ने की आदत से बन गई थी। आते-जाते हाथों से लिखे वे हिंदी के कुछ पन्ने कहीं न कहीं हमें अपनी जड़ों के अभी भी जीवित होने का अनुभव करा जाते थे। और इसलिए ‘सृजन’ से एक रिश्ता जैसा बनना शुरू हो गया था।

ये बात शायद 1993 अगस्त या सितंबर की है। मैं जब आई.आई.टी. में दूसरे साल के लिए घर से वापस आया और लगभग आदतन लाइब्रेरी के नोटिस बोर्ड पर ‘सृजन’ के नए अंक की खोज में पहुंचा तो मुझे ‘सृजन’ का नया अंक नहीं दिखा। पर जो दिखा उसे देखकर मेरे दिल की धड़कन एक घड़ी के लिए मानो ठहर ही गई। एक उदासी, निराशा, पीड़ा और अनजाने का भय और जाने कितनी ही भावनाएँ उस समय मेरे मन में आई होंगी। दरअसल ‘सृजन’ के तत्कालीन संपादक श्री आमोद यादव जी (अभी उत्तर प्रदेश में 1995 बैच के आई.ए.एस. ऑफिसर हैं और जो काफी व्यवहार-कुशल और तकनीकी-कुशल अधिकारी माने जाते हैं) ने अपनी व्यस्तताओं का हवाला देते हुए एक छोटा सा संपादकीय लिखा था जिसका भावार्थ कुछ ऐसा था कि अनेक प्रयासों के बावजूद ‘सृजन’ को आगे ले जाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था और शायद ‘सृजन’ भित्ति-पत्रिका अब हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। हालांकि, उन्होंने खुला आमंत्रण भी दिया था कि यदि कोई इस परंपरा को जारी रखने के लिए आगे आता है तो वह सहर्ष यह धरोहर उसे सौंपने के लिए तैयार हैं। 

अगर मैं ईमानदारी से कहूँ तो खतरों से खेलने का मुझे कभी शौक नहीं रहा है और जिम्मेदारी लेने और उसे अच्छी तरह से निभाने के फर्क को भी मैं बखूबी समझता था। फिर भी अपने स्वभाव से विपरीत मैं ‘सृजन’ का दायित्व संभालने के लिए आमोद जी के पास पहुंच गया। आमोद जी मुझे देखकर बड़े खुश हुए। थोड़ी-बहुत बातें भी हुईं और उन्होंने ‘सृजन’ के कुछ पुराने अंक मेरे हाथों में रख दिए और बिना किसी लिखा-पढ़ी के एक नई चुनौती को लेकर मैं हॉल-3 लौट आया ।

अब जब मैं सोचता हूं कि आखिर ऐसा क्या था कि जिसके कारण मैंने ये जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली तो कहीं न कहीं मुझे महसूस होता है कि ‘सृजन’ ने हमेशा मुझे अपनी जड़ों से जोड़े रखने का काम किया था। पराए आई. आई. टी. कानपुर में प्रथम परिचय ‘सृजन’ से ही हुआ था। और यह बात मुझे हमेशा रोमांचित करती रही है कि विश्व के ज्ञान के भंडार आई.आई.टी कानपुर की लाइब्रेरी के मुख्य नोटिस बोर्ड पर हिंदी की साहित्यिक रचनाओं के कुछ पन्ने हमेशा मौजूद रहते थे। इसे विरोधाभास कहिए या नियति की विडंबना, लेकिन अंग्रेजी के महासागर में हिंदी का एक छोटा सा द्वीप अपनी एक अलग पहचान बनाए अडिग, अटूट और अविचल खड़ा था।

‘सृजन’ भित्ति पत्रिका के संपादन का कार्य 1993 के उत्तरार्ध से मेरे पास आया और आने वाले दो सालों तक सभी साहित्य प्रेमियों के सहयोग से यह पत्रिका 3-4 पेज से बढ़कर 8-10 पेज तक पहुंच गई। और साथ ही लाइब्रेरी के नोटिस बोर्ड पर पत्रिका द्वारा घेरा गया क्षेत्रफल (एरिया) भी सानुपातिक रूप से बढ़ने लगा। ‘सृजन’ में जहाँ मैं एक पेज का संपादकीय लिखता वहीं मित्रगण ग़ज़ल, कविताएँ, व्यंग्य, लघुकथा वगैरह के माध्यम से सहयोग करते । बीच-बीच में दक्षिण भारतीय भाषाओं की भी कुछ रचनाएँ हमनें लीं । मुझे याद है केमिकल इंजीनियरिंग के वी. सुब्बाराव की एक तेलुगु कविता और उसका अंग्रेजी (या संभवतः हिंदी) सारांश भी ‘सृजन’ में प्रकाशित हुआ था।

यह हम सबकी युवावस्था का वो दौर था जब हम अपने हॉस्टल्स की लाइब्रेरी में लगने वाले ‘सेंटर स्प्रेड’ का बड़े चाव से इंतज़ार किया करते थे। सृजन’ को भी कुछ ऐसे ही, लेकिन साहित्यिक, शौक से पढ़ा जाता था। सहज, सरल, स्पष्ट हिंदुस्तानी भाषा में जीवन की वास्तविकताओं से जुड़ी ये रचनाएँ मित्रों के दिल को छूती थीं। उससे प्रेरणा लेकर हमनें निर्णय किया कि हम हिंदी (या अन्य भारतीय भाषाओं के हिंदी में उपलब्ध, जैसे ‘ययाति’) साहित्य की अच्छी रचनाओं में से कुछ चयनित अंश भी प्रकाशित करेंगे। यह प्रकिया बेहद रोचक थी।

मैं और संतीश चन्द्र गुप्त रूममेट थे। हर शुक्रवार की शाम मैं लाइब्रेरी जाता और घंटों व्यतीत करके हिंदी की कुछ किताबें हॉस्टल में लाता था। रात में खाना खाकर मैं उन्हें पढ़ने बैठता। अब यह कहना मैं जरूरी नहीं समझता कि वे रचनाएँ बड़ी रोचक, रसपूर्ण और हमारी जवानी के साहित्यिक समझ के अनुरूप होती थीं। जब मैं रात को 2-3 बजे तक थक जाता तब मैं सतीश को जगाता था और सतीश भाई ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सुबह 8-9 बजे तक जमकर उपन्यास पढ़ते थे और इसके बाद वो मुझे जगाते थे। इस तरह से मेरी साहित्य यात्रा में सतीश चन्द्र गुप्त, अजय लाल सहित कई मित्रों का भरपूर योगदान रहा है।

‘सृजन’ बढ़ता गया, फैलता गया, सराहा जाता रहा और चाहा जाता रहा। पर मेरे तीसरे या चौथे साल में लाइब्रेरी में कुछ नवीकरण का काम शुरू हुआ और कुछ समय के लिए नोटिस बोर्ड हटा लिया गया । मुझे लगा यह एक अस्थायी अवरोध है। पर काम पूरा के बाद जब मैं अंक लेकर नोटिस बोर्ड पर लगाने पहुँचा तो बताया गया कि चूँकि पहले ‘सृजन’ 3-4 पेज तक थी तो ठीक था पर अब 8-10 पेज की होने के कारण नोटिस बोर्ड पर जगह कम बचती है। लिहाजा लाइब्रेरियन ने यह निर्णय लिया कि ‘सृजन’ को लाइब्रेरी के नोटिस बोर्ड पर स्थान नहीं दिया जाएगा। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, लाइब्रेरियन से मिला भी पर शायद आखिरी निर्णय लिया जा चुका था। मैंने अपनी ओर से  प्रतिकार किया पर कोई सुनवाई नहीं हुई। बोला गया कि डायरेक्टर की ओर से यह निर्णय लिया गया है। मैं भी सिविल सर्विसेस की तैयारी में जुटना चाहता था सो मैं भी इस घटना को विधि का विधान मानकर चुप रह गया।

श्री आमोद जी ने जब मुझे ‘सृजन’ की जिम्मेदारी दी तब मैं उसे आगे बढ़ा पाया पर मुझे तो ‘सिस्टम’ ने ही मना कर दिया सो आगे इस परंपरा को बढ़ाने का मेरे पास कोई माध्यम नहीं था। आई.आई.टी. कानपुर में ‘सृजन’ को लाइब्रेरी में नहीं लगाने देने की घटना को मैं सिस्टम की संवेदनहीनता मानता हूँ और मैंने एक आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में हमेशा संवेदनहीनता से दूरी बनाए रखने की कोशिश की है। शायद आई.आई.टी की अनगिनत मीठी यादों के बीच ‘सृजन’ को बंद करा देने की घटना मुझे अभी भी टीस दे जाती है।

लगभग 24 साल बाद सतीश, राकेश, बिरला, गीतिका, आशीष जैसे मित्रों की प्रेरणा से कभी भित्ति-पत्रिका के रूप में निकलने वाली ‘सृजन’ आज अत्याधुनिक ई-फॉर्मेट में पुनः प्रकाशित होने जा रही है। यह समूह सबल है और तैयार है प्रकाशन के लिए भी, लेखन के लिए भी और संपादन के लिए भी। और स्वाभाविक रूप से मेरे लिए यह बहुत ही खुशी का पल है।

ढेरों शुभकामनाएँ मित्रों!

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2 thoughts on “आई. आई. टी. कानपुर में ‘सृजन’

  1. बहुत सुंदर आलेख … हिंदी में, प्रयास हो न पाने के रुदन को लेकर तमाम लोग व्यस्त रहते हैं, लेकिन एक प्रयास को संपन्न न होने देने की ऐसी कथाएं विरली हैं, यद्यपि इस पर भी बहस के हथियार खुले रूप में बिखरे पड़े हैं। संस्मरण को साझा करने के लिए धन्यवाद् ! अस्तु ! वैसे, आईआईटी कानपुर का पुस्तकालय हिंदी साहित्य की पुस्तकों का एक संपन्न आगार है। कोई थोड़ा समय भी बिताए, न जाने कितने ग्रंथ मिल जायेंगे।

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