01 मई

झूठा कवि

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

लिखा प्रपंच मानवता को
करुणा को तिरस्कार लिखा
वेदना में जब अश्रु फूटे
उस क्रंदन को अट्टाहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

समर में जब शोणित बहा
मैंने उसे शान्तिप्रयास लिखा
लाशों पर जब वेदना गरजी
उस गर्जन को परिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

क्रान्ति ज्वाल जब भड़की जन में
उस आग को मैंने ख़ाक लिखा
लिप्सा में मैंने बेचा खुदको
उस हवस को ज़ज्बात लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

पशु रक्षा में जब इन्सान कटे
मैंने इस हत्या को इन्साफ लिखा
जब भाई ने भाई को मारा
मैंने उस क्षण को उल्लास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

लिखा फ़रेब हर रिश्ते को
मैंने कृष्ण-प्रेम को विलास लिखा
सभ्यता को जो लील रही
उस खाई को आकाश लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

लिखा त्याग मैंने सत्ता को
घुप्प अँधेरों को प्रकाश लिखा
मिले घोषणा, वादे और प्रलोभन
मैंने जुमलों को भी विकास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

लिखा है बंधन को आज़ादी
मैंने मुक्ति को कारावास लिखा
सच-झूठ के फेर में आँखें मूंदी
लिखा झूठ, बदहवास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

मैंने सिन्धु को भी प्यास लिखा
मैंने झूठा सब इतिहास लिखा

अंकुर वत्स

आई. आई. टी. कानपुर, द्वितीय वर्ष, अर्थशास्त्र के छात्र

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