01 मई

चुनाव विशेषांक: लोकतंत्र महोत्सव

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकसभा-चुनाव के पावन पर्व पर आप सभी को शुभकामनाएँ!

लोकतंत्र में कितनी ही खामियाँ क्यों न हों, पर अभी तक मानव के द्वारा गढ़ी हुई यह शासन की सबसे अच्छी प्रणाली है। भारत जैसे विशाल, विविधताओं से भरे, जन-बाहुल्य देश में भी सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण 70 सालों से होता आ रहा है, यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। स्वतंत्र भारत की अब तक की कथा में एकमात्र अपवाद इंदिरा गाँधी के द्वारा 21 महीनों के लिए लागू आपातकाल का काला अध्याय ही है। आजादी के समय पता नहीं कितनों को भारत में लोकतंत्र के ऐसे सफल होने की संभावना दिखी होगी। लेकिन भारत के संविधान और संस्थान निर्माताओं ने जो नींव डाली थी, वह वाकई बहुत मजबूत है।

हमारे गणतंत्र में दो मंत्र निहित हैं। पहला, भारत एक गणराज्य है, यानी विभिन्न राज्यों से मिलकर बना है, प्रत्येक राज्य उसकी एक महत्वपूर्ण इकाई है। दूसरा, इन सारे राज्यों की माला हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ संवैधानिक लोकतंत्र के सूत्र में भी पिरोई हुई है। इन चुनावों में, इस मतों के बंटवारे के उन्माद में हम यह बात न भूलें, इसी में हमारी भलाई है।

आज से करीब 2,500 साल पहले वैशाली विश्व का पहला गणराज्य था जो अष्ट-कुल के नाम से जाना जाता था क्योंकि इसमें आठ महाजनपद (कह लीजिए कि उस समय के राज्य) शामिल थे। शक्ति में यह मगध के समकक्ष था, और इसके एक राज्य लिच्छिवी का राजा लोगों द्वारा चुना जाता था! राजा भरत की अर्वाचीन परम्परा में भी सत्ता का पिता से पुत्र को स्वत: हस्तांतरण नहीं होता था, योग्यता राजा बनने की अनिवार्य शर्त थी। तो हमारा गणतंत्र आधुनिक भले ही हो, पर जान-पहचान बहुत पुरानी है।

साथ ही राजनीति से भी जान-पहचान बहुत पुरानी है। राजधर्म और नीति से लेकर कूटनीति और राजनीति तक न केवल शब्द बदले, बल्कि शब्दों के मायने भी बदलते रहे हैं। आज राजनीति को बहुत आदर की दृष्टि से नहीं देखा जाता है। जब राजनीति सत्ता-शक्ति या सम्पन्नता की सीढ़ी ज्यादा हो और समाज की उन्नति का माध्यम कम, तो इस अनादर पर आश्चर्य कैसा?

राजनितिक संवाद की आज की स्थिति पर क्या कहा जाए? किसी भी टी.वी. चैनल के प्राइम टाइम पर होने वाली बहस ज्यादातर तू-तू-मैं-मैं और चीखना-चिल्लाना ही होती है। केवल इस चुनाव में ही नहीं, शायद चुनावी संवाद का स्तर हमेशा ही समाज की अपेक्षा से नीचे रहा है। मैं बहुत छोटा था, कक्षा एक में पढ़ता था, लेकिन मुझे 1980 के लोकसभा चुनाव में मेरे मोहल्ले में रिक्शे पर लाउडस्पीकर लगाकर टेप-रिकॉर्डर पर चुनाव-प्रचार के लिए बजते गाने की आरंभिक पंक्तियाँ अभी भी याद हैं :- “जगजीवन जीवन भर रुइहैं, बहुगुणा गुणा-भाग करत रहिहैं।” अब आप ही बताइए कि इसमें किस मुद्दे की गहरी चर्चा निहित है। आज फर्क सिर्फ इतना है कि मीडिया और सोशल-मीडिया के रिक्शे पर रखे लाउडस्पीकर सबकी उँगलियों पर उपलब्ध हैं। सब अपना राग अलाप रहे हैं, लेकिन स्तर शायद बहुत ज्यादा नहीं बदला है।

आज राजनीति सामाजिक सरोकारों से परे भले ही लगती हो, लेकिन उसका समाज पर गहरा असर पड़ता है, इसलिए साहित्य न तो राजनीति से उदासीन रह सकता है, और न ही राजनीति की तरह उथला और सतही। हिन्दी साहित्य में राजनीतिक आलोचना की समृद्ध परम्परा है। चाहे वो दिनकर की नेहरू की चीन युद्ध-नीति पर रोष भरा गीत हो, बाबा नागार्जुन के नेहरू और इंदिरा गाँधी पर चुभती कविताएँ हों, दुष्यंत की ललकारती ग़ज़लें हों, या परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, ज्ञान चतुर्वेदी के नुकीले व्यंग्य बाण, हिन्दी साहित्यकारों ने अपने दायित्वों का निर्वाह हमेशा किया है।

सृजन के इस अंक में हम इसी दायित्व को निभा रहे हैं। हम सामायिक, राजनितिक, सामाजिक, ज्वलंत, और विवादस्पद मुद्दों से मुँह नहीं फेरेंगे। लेकिन साथ ही थोथी राजनीति भर नहीं लिखेंगे, बल्कि हमेशा विमर्श की साहित्यिक कसौटी पर खरा उतरने के लिए प्रयासरत रहेंगे। विचार और भावनाएँ सलीके से अभिव्यक्त की जाएँगी, पक्ष-विपक्ष रखने के लिए, एक-दूसरे को समझने के लिए, तर्क-कुतर्क या जीत-हार के लिए नहीं। हम विसंगतियों और विडम्बनाओं पर चोट करने से पीछे नहीं हटेंगे। और यह चोटें तीखी होंगी, करारी होंगी, लेकिन उसके मूल में अंध-विरोध नहीं होगा, केवल हमारे प्रजातंत्र की उन्नति की भावना होगी।

इस अंक में हम अतीत के कुछ दिग्गजों की चुनी हुई कालजयी रचनाओं को भी लाये हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं और प्रेरणास्रोत भी।

इस सब को समेटे सृजन का चुनाव-विशेषांक आपके सामने है। आपको हमारा प्रयास कैसा लगा यह आप कमेंट करके हमें जरूर बतलाइए।

सहयोग और सहभागिता की आशा के साथ,
आपका,
सतीश चन्द्र गुप्त

अनुक्रमणिका

कालजयी रचनाएँ:

06 अप्रैल

बकैती से बिजनेस तक

“अबे पंडित, आज ये गज़ब कैसे भाई, हैलेट भिजवाने का जुगाड़ है क्या? संडे को नहा धो के सुबह सुबह होस्टल की मेस में?” B-Mid के तेलू गैंग के लड़के सकते में। क्यों? आते हैं, धैर्य रखें।

पंडित माने IITK हॉल 2 के बकैत श्रीमान सौरभ अवस्थी, बाप का करोड़ों का बिज़नस, डील डौल से फिल्मी कदकाठी के मालिक और किस्मत न जाने किस नक्षत्र में लिखा के लाए हैं कि भाई साहब चाहे लेक्चर जाएँ न जाएँ, किसी को exam के लिए कभी exam वाली पढ़ाई तो करते दिखे नही लेकिन जब exam के रिजल्ट आएँ तो भाईसाहब की जेब मे दस के पूरे दस – चाँपू, दस्सू या फोड़ू जो भी कह लें। अब ये कहाँ का न्याय हुआ? भगवान कृष्ण गीता में अर्जुन को बड़े लंबे से समझाये की कर्म में विश्वास रखो, फल की चिंता न करो। अब जब बैच में पंडित जैसे प्राणी बिना मेहनत किये दस्से का रायता फैलाने के लिए अवतरित हो जाएँ तो लोग काहे फल की चिंता न करें। इतिहास गवाह है कि जब जब गीता के जज्बाती खयालों में बह के तेलू गैंग के नादान अर्जुनों ने फल की चिंता छोड़ी है, तब तब कांड हुआ है, और ऐसा वैसा कांड नहीं, इतना दर्दनाक (वैचारिक स्वतंत्रता में इसे शर्मनाक भी कहा जा सकता है) कि इसकी गूंज दो बैच नीचे और दो बैच ऊपर तक सुनाई दी है। ख़ैर, IIT में रोन्दुओं की कोई जगह नही, रोना IITian के सम्मान के ख़िलाफ़ है। इस मामले में तेलू-चाँपू एक समान, पूरी बिरादरी एक। इसीलिए मिड-सेम और एन्ड-सेम के ठीक पहले वाली रात तेलू और चाँपू एक ही कमरे में समभाव के अद्भुत उदाहरण रूप में देखे जा सकते हैं, जैसे शेर और हिरण नदी के एक ही किनारे पर एक साथ पानी पी रहे हों।

जाहिर है जिस बंदे के बिना पढ़े दस्से लग रहे हों और IITK की ज़िंदगी का कोई ऐसा कोना बाकी नही जिसमे उसकी शिरकत न हो तो ऐसे बंदे की ज़िंदगी से कोई क्यों न जले और वो भी सुलग-सुलग के, रोज including weekends। पंडित के बड़े जलवे हैं IITK में इसमे कोई दो राय नही। और इन जलवों का एक पहलू है GH में पंडित की गहरी पैठ। जिसे अपनी खुद की मदद करने से फुरसत मिली रहती है वो अक्सर philanthropist बन जाया करते हैं। अब आप यूँ समझो कि एक तरफ सभ्यता, सौम्यता एवं शिष्टता का कटोरा लिए पुरुषवर्ग की जनता GH के आसपास प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में लोटती रहे और ये महाराज अपने ज्ञान की बकैती रोज सुबह शाम GH में मुफ्त बाँटते पाए जाएँ| जहाँ फूटी किस्मत के मारे साधारण होस्टल निवासी GH के single entry visitor visa से धन्य हो जाते, वहीं सौरभ अवस्थी को GH का greencard मिला हुआ था। वैसे जब सौरभ अवस्थी नए नए IITK में प्रवेश किये तो खूब अफवाह फैली कि इनके IIT में चयन होने पर मिस इंडिया की बधाई का फ़ोन आया था। जनसाधारण में ऐसी मान्यता है कि मिस इंडिया इनकी मम्मी की साइड में किसी रिश्तेदारी में आती हैं। ख़ैर ये सब सुनी-सुनाई मौज लेने वाली चुस्कियाँ हैं, IITK में इन बातों का बड़ा महत्व है और ऐसी बातों को पूरी इज़्ज़त से सामान्य ज्ञान का दर्जा प्राप्त है। वर्ना क्या जरूरत थी पंडित के बारे में बात करते करते ऐसी gossip में उतरने की।

पंडित के जलवे रखें एक तरफ, एक बात जो सब मानते हैं की पंडित का दिल बड़ा साफ है। जो मन मे है वो जुबाँ पर और जो जुबाँ पर वह ही यथार्थ में जिंदगी के action में फिर चाहे कोई कुछ भी सोंचे और कुछ भी कहे। पंडित को lesser mortals की खिट-पिट और खिचिर-पिचिर में कोई रुचि नही। उसे ज़िन्दगी को अनुभव करना आता है। उसे खुश रहना आता है। पंडित का कोई दुश्मन नही। हालाँकि सिर्फ एक बात में पंडित का हाथ तंग है और वो है अंग्रेजी बोलने में। लेकिन लिख-पढ़ पाने और समझने में कोई कमी नही। IITK प्रवेश के समय की बात और थी लेकिन अब जब GH में झंडा गड़ा हो और exam में भर भर के दस्से आ रहे हों तो अंग्रेजी बोलना न बोलना पंडित के लिए IIT की ज़िंदगी मे कोई इत्तेफाक नही रखता।

पंडित ने IIT की first year की लाइफ को पूरी ज़िंदादिली और बकैती से जिया। कुछ नही छोड़ा, कैंटीन, सुट्टा, दारू, फुटबॉल, अन्तरागिनी, इलेक्शन, प्रोटेस्ट, डिबेट, मैग्गी, स्विमिंग पूल, फ्लाइंग क्लब, सोशल क्लब, और तो और कैंपस के अंदर बच्चों के स्कूल में पढ़ाया भी, कुछ भी नही छोड़ा।

दुनिया के लिए IIT में घुसना भले ही रुतबे के साथ लाइफ सेट होना हो, लेकिन पंडित को जीवन बीमा पालिसी की कोई जरूरत थी ही नहीं। उसका मन तो स्कूल टाइम से ही चपका था IIT कैंपस की जिंदगी में, वहाँ की आबो-हवा में कुलाँचे भरती इनटेलेक्चुअल ऊर्जा में और इन सब से भी कहीं ज्यादा दुनिया जहान के तमाम बांधों में दबी उसकी अन्तरात्मा को वैचारिक स्वतंत्रता का निर्वाण। पंडित का IIT में आने का सिर्फ एक मकसद – IIT की इस अनमोल अनुभव के हर लम्हे को जी लेना। और यही किया उसने, पिछले डेढ़ सालों में एक पूरी जिंदगी जी ली उसने।

पंडित का IIT में चौथा सेमेस्टर चल रहा है और आज IIT में उसका आखिरी दिन। किसी को इस बात का जरा भी अंदेशा नही है, B-Mid के तेलू गैंग को भी नही जिनके साथ सौरभ ने साल बिताए। पंडित आज आखिरी बार होस्टल मेस के आलू पराठों में आलू ढूँढेगा। वो होस्टल में लौटेगा, आखिरी बार अपने रूम को देखेगा और फिर उसकी जिंदगी का रास्ता एक नया मोड़ ले लेगा। कल फिर सुबह होगी, IIT के तेलू और चाँपू सब अपने तेलू धर्म और चाँपू धर्म के अनुसार अपनी कहानी आगे बढ़ाएंगे। ये IIT का एक सच है। पंडित कल से अपने पिता जी का बिज़नेस आगे बढायेगा। लोग इसकी आलोचना करेंगे, आश्चर्य करेंगे, समीक्षा करेंगे लेकिन पंडित भी इसी दुनिया का एक और सच है।

06 अप्रैल

पुण्य सँजो कई जन्मों का

पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ
अब झेलो मुझको, मैं तुम सबके पाप गिनाने आया हूँ

चाहा तो तुमने भी होगा कि मुझसे रिश्ता टूट सके
राह बदल कर, चाल बदल कर, मुझसे पीछा छूट सके
पर भाग्य ठगे न केवल मुझको, तुम भी उससे हारे हो
घूम-फिरे तुम दुनिया भर पर फिर भी साथ हमारे हो
बचा रह गया, भूला-बिसरा उधार चुकाने आया हूँ
पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ

अब साथ चल रहे मेरे तुम जो, थोड़ा ये उपकार करो
झेल रहे हो मुझको कब से, तो इतना और यार करो
लेन-देन का ये खाता, भई इसको यों ही चलने दो
हिसाब बराबर न हो देखो, कुछ तो बाकी रहने दो
समझो यों अगले जन्मों का व्यापार बढ़ाने आया हूँ
पुण्य सँजो कई जन्मों का इस बार धरा पे आया हूँ

06 अप्रैल

सवाल उम्र भर के लिए

आई आई टी के चार साल
हर दिन एक अलग पन्ना
हर रात एक नया किस्सा
इन्ही पन्नों में इन्ही किस्सों में
उन दिनों जवान होती हमारी समझ से परे
ऐसा भी एक भी हिस्सा

वो हिस्सा
जहाँ हर जवाब बस एक सवाल बन के रह गया
जहाँ फलसफ़े की रोशनी में नहा के
ज़िन्दगी अंधेरों से ज्यादा काली दिखने लगी
और हर यकीन सिर्फ एक ख़याल बन के रह गया

वो भी तो दोस्त था, वो भी था हमसफ़र
तमाम और लोगों सा,
वक़्त से जूझता उधेड़ता बुनता
किताबों, इम्तहानों, कैंटीन, लाइब्रेरी और
वक़्त बेवक़्त के बुल्लों में यहाँ-वहाँ
शायद कुछ कम कहता मगर सबकी सुनता

पर हमें क्या पता
कि उम्मीदों के इस मंदिर में भी
किन खयालों के दाँव-पेंच से वो मज़बूर हो गया
दोस्ती और दुनियादारी के दायरों से आगे
साथ रह के भी न जाने कब इतना दूर हो गया

हम अपने सपनों को ज़िन्दगी समझते रहे
और वो ज़िन्दगी को फ़िज़ूल का सपना
हमारी जद्दोजहद थी सफ़र शुरू करने की
और उसका जुनून बन गया सफ़र खत्म करना

साथ बैठे, वक़्त गुजारा
तहे दिल से कोशिश की
समझने और समझाने में कुछ और वक़्त बीत गया
हमारे सब फलसफे हार गए
आखिर एक दिन उसका जुनून जीत गया

उस रोज आई आई टी में फिर से
एक और सांस ज़िन्दगी के हाथों से फिसल गई
एक बार फिर अपने जवाबों की तलाश करते करते
किसी की तलाश एक उम्र भर के सवाल में बदल गयी

06 अप्रैल

बिहारी बाबू का कानपुर प्रवास

बात सन् 1991 की हैं। हम बोर्ड़ परीक्षा पास कर के पटना साइंस के हॉस्टल में विराजमान हो चुके थे। जो भी हॉस्टल में थे वो बोर्ड पास कर के इंजीनियरिंग के तैयारी में थे। तो हम भी लग गए तैयारी में। किसी मध्यवर्गी बिहारी परिवार की तरह सारी कोशिश एक सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज की जनरल सीट के लिए थी। वैसे भी न पैसे का शोर, न पैरवी की औकात, तो सारा जोर प्रतिभा पर (बाद में पता चला इसे ‘मग्गा’ कहते हैं)। झारखण्ड के एक आदर्श जाति-विहीन आवासीय विद्यालय के पठार से उतर कर, पटना के संकीर्ण जाति-आरक्षित हॉस्टल में रहना स्वयं में एक अनुभव था। खैर, इस पर फिर कभी फुर्सत से चर्चा की जाएगी। साल बीते, पहली बार तो न हो पाया पर दूसरी बार में पप्पू पास हो गया। और पहुँचा कॉउन्सलिंग के लिए आई. आई. टी. कानपुर।

हमारे कुछ मित्र तो पहले ही प्रयास में सौ योजन लाँघ चुके थे, कॉउन्सलिंग के समय कानपुर में ही थे। गर्मियों की छुट्टी में वहाँ क्यों थे, यह मत पूछिए – समझदार को इशारा काफी है। मेरा जो All India Rank था उसमें सिविल इंजीनियरिंग के अलावा कानपुर और दिल्ली में कुछ नहीं मिलता। हमने भी वही भरा सबसे ऊपर दाखिले के विकल्पों में। आखिरी में तीन विकल्प भरे: आई. आई. टी. कानपुर कम्प्यूटर साइंस, आई. आई. टी. दिल्ली कम्प्यूटर साइंस, आई. आई. टी. बॉम्बे कम्प्यूटर साइंस। ये बकैती भी उन्ही वहाँ गर्मी की छुट्टियाँ बिताने वाले मित्रों की देन थी।

कॉउन्सलर ने बड़े ध्यान से मेरा दाखिला फॉर्म देखा, फिर मुझे देखा, फिर से दाखिला फॉर्म देखा, और बोला, “अंतिम तीन पहले से ही भर चुके हैं, कुछ और ब्रांचों के विकल्प भर दो।” शायद उन्हें लगा कि मुझे कम्प्यूटर साइंस की रैंकिग के बारे में पता नहीं है। मैं भोला सा मुँह बनाकर बोला, “सिविल मेरी फर्स्ट चॉइस है, लेकिन अगर सिविल नहीं मिली और कम्प्यूटर साइंस मिल गयी, तो भी ले लूँगा।” कॉउन्सलर अवाक था कि अभी एडमिशन भी नहीं हुआ है और आलम ये है! उसने एक नजर मेरे वहाँ गर्मियाँ बिताने वाले दोस्तों की तरफ देखा। शायद मन ही मन में सोच रहा होगा कि अगली साल मैं भी उन्ही की तरह वहीं मिलूँगा। खैर, मैं अड़ा रहा।

कॉउन्सलिंग खत्म हुयी। मित्रों को जीत की सूचना देकर मैं अकेले ही हॉस्टल की तरफ निकल पड़ा। मन ही मन अपनी धृष्टता पर खुश हो रहा था। ये उम्र का वो दौर था जब धृष्टता का जश्न मनाया जाता था। मैं विचारों में खोया पग-पग नाप रहा था तभी सामने से आते एक छात्र ने पूछा, “gentleman, which way is L7?” आसपास कोई नहीं था, तो जाहिर था कि मुझसे ही पूछ रहा था। अभी तक ‘अबे’ की आदत थी, ‘Gentleman’ कुछ ज्यादा ही हो गया। मन में कौंधा कि क्या ये सीनियर है, और कहीं मेरी रैगिंग तो नहीं कर रहा है? मैं शुरू हो गया, “फ्रेशर, हवा एक हज़ार…।” उसने बीच में ही मेरी बात काट दी, “I am also fresher, help me navigate to L7.” मैंने इशारों से उसे L7 का रास्ता समझाया। समझ में आया कि यहाँ सिर्फ ‘medium of instructuon’ ही इंग्लिश नहीं हैं , ‘medium of communication’ भी इंग्लिश ही हैं। बड़ा डर गये हम, और डरना जायज भी था।

और फिर चार साल तक वॉट लगी रही। IIT तो JNU टाइप जगह नहीं हैं। जल्दी ही निकाल भी देते हैं। किसी तरह हम निकाल लिए। और फिर नौकरी भी ढूँढनी पड़ती हैं। हमारे टाइप के लोगों की एक ड्रीम कंपनी हुआ करती थी Infosys – न डिपार्टमेंट की पाबंदी और न ही CPI की जंजीरें। एक ‘बूझो तो जाने’ यानी कि multiple choice वाला टेस्ट लेते थे, फिर साक्षात्कार। हम भी पहुँचे। टाई लगाकर, उजला शर्ट, काला पैंट और (रूममेट का) काला जूता पहनकर। बिलकुल जेंटलमैन वाला लुक। जूता बहुत काट रहा था, हमारी आदत नहीं थी न। लम्बी कतार थी visitor hostel में। गर्मी भी कानपुर वाली। बहुत uncomfortable टाइप फील हो रहा था, पसीना ताबड़तोड़।

“Feel comfortable, चाहे तो टाई उतार सकते हैं,” अंदर घुसते ही इंटरव्यू लेने वाले बोले। “उतार तो देंगे, लेकिन फिर पहन नहीं पाएँगे,” मैंने जवाब दिया। दोस्तों ने समझाया था कि “be truthful in interview” और मैं उनकी सलाह का अक्षरश: पालन कर रहा था। स्टेट बोर्ड वाले टाई की गाँठ एक बार ही किसी से बँधवा लेते हैं, बार-बार खोलना-बाँधना उनसे नहीं होता। शायद वे भी किसी स्टेट बोर्ड के रहे होंगे, मेरी परेशानी समझ गए। बातें आगे बढ़ी।

अगला सवाल, “तुम एक हफ्ते में कितनी बार computer center जाते हो?”

“मैं आज तक सिर्फ दो बार ही गया हूँ – एक लॉगिन लेने और एक बार लौटाने।”

“Interesting! जब जाना नहीं था तो लॉगिन लिया क्यों?”

“सर, पच्चीस पेज का printout का quota होता है हर महीने का, बहुत काम आते हैं,” मैं बहुत संयम और धैर्य से जवाब दे रहा था।

“तुम्हारा CPI इतना कम क्योँ है?” वो शायद सच में जानना चाहते थे।

“सर, कम कहाँ हैं? मेरे टाइप लोगों का इतना ही होता हैं,” मैंने सच्चा जवाब दिया।

“तुम्हारी डिग्री सिविल में हैं, फिर तुम कम्प्यूटर में क्यों काम करना चाह रहे हो?”

“सर, मुझे न तो सिविल आती हैं, और न कम्प्यूटर। जो भी नौकरी मिलेगी वो सीख लूँगा।”

भला हो Infosys का, जिसने न सिर्फ नौकरी दी, बल्कि ज्वाइन करने के पहले दो-दो बार इजाफा भी दिया।

आखिरी सेमेस्टर बहुत मजे में कटा। नौकरी मिल गयी थी, केवल फक्का बचाना था। बहुत मेहनत की। End Sem के दिन पढ़ाई भी की और बचा लिया। मई 1996 में निकल लिए कानपुर से, हमेशा के लिए। गर्भ-नाल कट गया।

अब सोचता हूँ कि अगर एक-आध सेमेस्टर और रूक जाते तो शायद ज्यादा मज़ा आता। वैसे भी क्या उखाड़ लिये!

06 अप्रैल

तेलुओं की जय हो

पिछले साल दशहरे की छुट्टियों में मैं गुड़गाँव गई थी। ओला कैब में बैठ कर, बच्चों के साथ, सोहना रोड की तरफ जा रही थी, एक बचपन की सहेली से मिलने। गाड़ी लाल बत्ती पर रुकी हुई थी और मैं अपने ख्यालों में खोई हुई थी कि बगल वाली गाड़ी से एक प्यारी सी आवाज़ सुनाई पड़ी। मेरी कोई हमउम्र अपने बच्चे को प्यार से समझा रही थी, अंग्रेजी में “Darling, I will get you those puzzles tomorrow on my way back from office. Now come on give me a smile.”

मुझे उसका चेहरा दिख नहीं रहा था, लेकिन यकायक मुँह से निकला “मनीषा???” अगले ही क्षण उसने अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाया। हाँ, वो मनीषा ही थी। उसने मुझे कुछ क्षणों तक घूरा और इतने में ही ट्रैफिक की बत्ती हरी हो गयी। अब गुडगाँव की सड़कें और उस पर यातायात, किसी दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु से कम थोड़ी है। मेरा ओला वाला गाड़ी आगे बढ़ा चुका था, मैं थोड़ी सी सकुचायी हुई थी, यह सोचकर कि शायद उसने मुझे पहचाना नहीं। पर फिर भी मैं उसकी ही तरफ देख रही थी। उसने भी अपनी हुंडई एक्सेंट कार आगे बढ़ायी और चिल्लायी, “गीतिका!” फिर उसने अपनी कार को थोड़ा आगे ले जाकर, सड़क के बायीं तरफ किनारे पर रोक दिया। हाँ, उसने भी मुझे पहचान लिया था, मैंने ठंडी सांस भरी और अपने ओला वाले से रुकने को कहा। वो थोड़ा अनमनाया, पर फिर रोक कर बोला, “ज़रा जल्दी कीजिये मैडम।” हम दोनों अपनी अपनी गाड़ियों से उतर कर गर्मजोशी के साथ मिले, आखिर २३ साल बाद मिल रहे थे। वो फर्राटे से अंग्रेजी में बात कर रही है। गुड़गाँव में अपनी एक कंपनी चलाती है। कुछ 70-80 लोगों की कंपनी है उसकी और काम भारत के बाहर भी फैला हुआ है। देखने और बात करने के ढंग में सफलता साफ़ झलक रही थी। हमने एक दूसरे के फ़ोन नंबर अदल-बदल कर लिए और जल्दी मिलने का वादा कर हम अपने अपने रास्ते चल दिए।

अब तो मेरे ख्यालों का रंग ही बदल गया था। क्या ये वही मनीषा थी जिसे IIT में अंग्रेजी ज़रा सी भी नहीं आती थी, और तो और परम तेलू समझा जाता था? यहाँ तक कि उसे वहाँ से निकलना पड़ा था कोर्स में उत्तीर्ण न हो पाने की वजह से। चौंक गए? चलिए २४-२५ साल पीछे चलते हैं, और पूरा किस्सा बताती हूँ।

हम कुछ लोग IIT में JEE की परीक्षा उत्तीर्ण करके नही आये थे। हम लोग एक अलग परीक्षा देकर स्नातक की डिग्री लेने के लिए 2 साल के लिए आई. आई. टी. में दाखिल हुए थे। हमें MSc 2yr में दाखिला मिला था, लेकिन हमारी सारी कक्षाएँ BTech या Integrated MSc वालों के साथ ही होती थीं। स्वाभाविक था की वो JEE वाले लोग हमें अलग लगते थे। हालाँकि किसी के भी सिर के पीछे कोई अलग सा तेज हो या किसी के पास उड़ने वाले पर हों, ऐसा तो मैंने नहीं देखा, पर ऐसा हम सोचते थे कि शायद उनका दिमाग ज़्यादा तेज़ चलता होगा। हमारी इस सोच की वजह से क्या हम कक्षा शुरू होने के पहले ही कक्षा के तेलुओं में शामिल हो जाते थे? शायद…

यहाँ से हमारी मनीषा की बात शुरू होती है – उसे अंग्रेजी ज़रा कम आती थी, यों समझिए ना के बराबर। हमारा दाखिला एक प्रवेश परीक्षा के बाद हुआ था और वो परीक्षा अंग्रेजी में ही थी। तो उसने कैसे उस प्रवेश परीक्षा को पार किया, ये पता नहीं। पर सच ये है कि यहाँ सभी शिक्षक अंग्रेजी में ही पढ़ाते हैं। ऐसे में वो किसी भी पाठ को आसानी से समझ नहीं पाती थी। कभी-कभी मैं उसको पाठ हिंदी में समझा देती थी। पर ये काफी मुश्किल था। जब पहली बार क्विज हुईं, तो उसे बहुत कम अंक मिले। धीरे धीरे वो काफी परीक्षाओं में असफ़ल होने लगी। हम कुछ सहपाठियों को उसकी चिंता हुई और हमने उसे थोड़ा और पढ़ाना शुरू किया। लेकिन अपनी खुद की पढ़ाई और बाकी खेल-वेल के बाद हम उसे उतना समय नहीं दे पाते थे, जितने की शायद उसे ज़रुरत थी। वो पहले ही सेमेस्टर में 6 में से 4 विषयों में अनुत्तीर्ण हो गयी। वो ही नहीं, हम सब घबरा गए कि अब क्या होगा, कैसे वो आगे पढ़ेगी। अगले सेमेस्टर में भी ऐसा ही कुछ हुआ, 5 में से शायद 3 या 4 विषयों में वो उत्तीर्ण नहीं हो सकी।

इंस्टिट्यूट की तरफ से उसे चेतावनी मिली की अगर उसने कुछ विषयों में सफलता नहीं दिखाई तो उसे आई आई टी से निकाल दिया जाएगा। हम सब ने काफी कोशिश की उसे पढ़ाने की। और कुछ मिंत्रों ने इंस्टिट्यूट से भी निवेदन किया कि उसे थोड़े मौके और दिए जाएँ, और अंग्रेजी सीखने में मदद भी। इंस्टिट्यूट ने उसे 2-3 बार मौके दिए, लेकिन कुछ नहीं हो पाया। आखिरकार, उसे इंस्टिट्यूट छोड़ना पड़ा।

अब मेरे मन में कुछ सवाल हैं: क्या अंग्रेजी ना जानना ही उसका अपराध था? या फिर उसको सच में विषय ही समझ नहीं आता था? तो फिर उसका दाखिला भी कैसे हुआ? तो क्या इंस्टिट्यूट को अंग्रेजी कि कक्षाएँ भी शुरू कर देनी चाहिए? या बाकी जगहों की तरह ट्यूसन?

अगर हमारी कक्षाएँ JEE वालों के साथ न होकर, केवल MSc 2yr वालों के साथ होती, तो क्या तब भी वो सफल नहीं हो पाती? अगर, हम सभी अपने आप को JEE वालों के सामने पहले से ही तेलू न मानते, तो क्या कुछ फर्क पड़ता? क्या पता? मुझे इस बात की हमेशा ख़ुशी होती थी कि हमें JEE वालों से न तो अलग कक्षाओं में पढ़ाया जाता था और न ही अलग परीक्षाएँ थी। हम सब एक थे।

पर उस पूरे दौर से जो गुज़र रही थी, उसे कैसा लगता था? क्या हम सहपाठियों ने उसका ठीक से साथ दिया था या उसे कभी अकेलापन लगता होगा? IIT से निकाल दिए जाने से क्या उसका जीवन नष्ट हो गया? नहीं!

मुझे ये लिखते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि उसने कभी हताश होने की बात नहीं की, न ही कभी आत्महत्या जैसे तीव्र कदम उठाने की। इंस्टिट्यूट से निकलने के बाद उसने अपना अलग एक काम शुरू किया था। सिर्फ ये ही नहीं, जब भी मिलती वो खुश नज़र आती। IIT से निकलने का दुःख तो था उसे, पर वो टूटी नहीं थी।

और आज की मनीषा को देख कर तो मैं खुश हूँ और बेहद चकित। कौन उसे तेलू कहता है? अगर कहता है तो मै कहूँगी: तलुओं की जय हो!

06 अप्रैल

आई. आई. टी. कानपुर में ‘सृजन’

आई. आई. टी. कानपुर में प्रवेश को लेकर एक शायद थोड़ा भय-मिश्रित आनंद मेरे मन में शुरुआती दिनों में था। प्रवेश के बाद हम सभी को अंग्रेज़ी के एक टेस्ट से होकर गुजरना था। मैंने भी परीक्षा दी और खालिस हिंदी भाषी और हिंदी भक्त होने के बावजूद पास हो गया। मेरे जो मित्र चाहे आलस के कारण या अन्य किसी कारण से पास नहीं हो पाए, उन्हें पहले सेमेस्टर में ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंस के अंतर्गत अंग्रेजी का कोर्स लेना पड़ा। उस कोर्स की परीक्षा पास करने के बाद वे भी अंग्रेजी के सर्टिफाइड जानकार बन गए। वैसे जब लेक्चर शुरू हुए तो हर प्रोफेसर के अंग्रेजी बोलने का अपना एक अलग ही अंदाज देखने को मिला और मैंने महसूस किया कि यह जगह पराई है और वाकई मैंने अपने आपको ‘आउट ऑफ प्लेस’ जैसा पाया । 

ऐसे संक्रमण काल में जिन दो चीज़ों ने मेरा उत्साहवर्धन किया वे थे — लाइब्रेरी का समृद्ध हिंदी/संस्कृत पुस्तकों का संग्रह और लाइब्रेरी में ही नोटिस बोर्ड पर हर महीने चस्पा की जाती भित्ति-पत्रिका ‘सृजन’। भले ही सृजन हाथ से लिखी हुई पाँच-सात पन्नों की एक साहित्यिक भित्ति-पत्रिका रही हो, पर वो शायद मेरे जैसे कई हिंदी पृष्ठभूमि वाले छात्रों के लिए और मेरे जैसों की कल्पना से परे आई. आई. टी. कानपुर में एक अपनेपन का एहसास दिलाती थी।

मैं और मेरे जैसे कई अन्य लोग भी इस भित्ति-पत्रिका के नए अंक के आने का इंतज़ार किया करते थे जो लगभग हर महीने लाइब्रेरी की नोटिस बोर्ड पर कहीं से भी आ जाया करती थी । हमें उसे बार-बार पढ़ने की आदत से बन गई थी। आते-जाते हाथों से लिखे वे हिंदी के कुछ पन्ने कहीं न कहीं हमें अपनी जड़ों के अभी भी जीवित होने का अनुभव करा जाते थे। और इसलिए ‘सृजन’ से एक रिश्ता जैसा बनना शुरू हो गया था।

ये बात शायद 1993 अगस्त या सितंबर की है। मैं जब आई.आई.टी. में दूसरे साल के लिए घर से वापस आया और लगभग आदतन लाइब्रेरी के नोटिस बोर्ड पर ‘सृजन’ के नए अंक की खोज में पहुंचा तो मुझे ‘सृजन’ का नया अंक नहीं दिखा। पर जो दिखा उसे देखकर मेरे दिल की धड़कन एक घड़ी के लिए मानो ठहर ही गई। एक उदासी, निराशा, पीड़ा और अनजाने का भय और जाने कितनी ही भावनाएँ उस समय मेरे मन में आई होंगी। दरअसल ‘सृजन’ के तत्कालीन संपादक श्री आमोद यादव जी (अभी उत्तर प्रदेश में 1995 बैच के आई.ए.एस. ऑफिसर हैं और जो काफी व्यवहार-कुशल और तकनीकी-कुशल अधिकारी माने जाते हैं) ने अपनी व्यस्तताओं का हवाला देते हुए एक छोटा सा संपादकीय लिखा था जिसका भावार्थ कुछ ऐसा था कि अनेक प्रयासों के बावजूद ‘सृजन’ को आगे ले जाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था और शायद ‘सृजन’ भित्ति-पत्रिका अब हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। हालांकि, उन्होंने खुला आमंत्रण भी दिया था कि यदि कोई इस परंपरा को जारी रखने के लिए आगे आता है तो वह सहर्ष यह धरोहर उसे सौंपने के लिए तैयार हैं। 

अगर मैं ईमानदारी से कहूँ तो खतरों से खेलने का मुझे कभी शौक नहीं रहा है और जिम्मेदारी लेने और उसे अच्छी तरह से निभाने के फर्क को भी मैं बखूबी समझता था। फिर भी अपने स्वभाव से विपरीत मैं ‘सृजन’ का दायित्व संभालने के लिए आमोद जी के पास पहुंच गया। आमोद जी मुझे देखकर बड़े खुश हुए। थोड़ी-बहुत बातें भी हुईं और उन्होंने ‘सृजन’ के कुछ पुराने अंक मेरे हाथों में रख दिए और बिना किसी लिखा-पढ़ी के एक नई चुनौती को लेकर मैं हॉल-3 लौट आया ।

अब जब मैं सोचता हूं कि आखिर ऐसा क्या था कि जिसके कारण मैंने ये जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली तो कहीं न कहीं मुझे महसूस होता है कि ‘सृजन’ ने हमेशा मुझे अपनी जड़ों से जोड़े रखने का काम किया था। पराए आई. आई. टी. कानपुर में प्रथम परिचय ‘सृजन’ से ही हुआ था। और यह बात मुझे हमेशा रोमांचित करती रही है कि विश्व के ज्ञान के भंडार आई.आई.टी कानपुर की लाइब्रेरी के मुख्य नोटिस बोर्ड पर हिंदी की साहित्यिक रचनाओं के कुछ पन्ने हमेशा मौजूद रहते थे। इसे विरोधाभास कहिए या नियति की विडंबना, लेकिन अंग्रेजी के महासागर में हिंदी का एक छोटा सा द्वीप अपनी एक अलग पहचान बनाए अडिग, अटूट और अविचल खड़ा था।

‘सृजन’ भित्ति पत्रिका के संपादन का कार्य 1993 के उत्तरार्ध से मेरे पास आया और आने वाले दो सालों तक सभी साहित्य प्रेमियों के सहयोग से यह पत्रिका 3-4 पेज से बढ़कर 8-10 पेज तक पहुंच गई। और साथ ही लाइब्रेरी के नोटिस बोर्ड पर पत्रिका द्वारा घेरा गया क्षेत्रफल (एरिया) भी सानुपातिक रूप से बढ़ने लगा। ‘सृजन’ में जहाँ मैं एक पेज का संपादकीय लिखता वहीं मित्रगण ग़ज़ल, कविताएँ, व्यंग्य, लघुकथा वगैरह के माध्यम से सहयोग करते । बीच-बीच में दक्षिण भारतीय भाषाओं की भी कुछ रचनाएँ हमनें लीं । मुझे याद है केमिकल इंजीनियरिंग के वी. सुब्बाराव की एक तेलुगु कविता और उसका अंग्रेजी (या संभवतः हिंदी) सारांश भी ‘सृजन’ में प्रकाशित हुआ था।

यह हम सबकी युवावस्था का वो दौर था जब हम अपने हॉस्टल्स की लाइब्रेरी में लगने वाले ‘सेंटर स्प्रेड’ का बड़े चाव से इंतज़ार किया करते थे। सृजन’ को भी कुछ ऐसे ही, लेकिन साहित्यिक, शौक से पढ़ा जाता था। सहज, सरल, स्पष्ट हिंदुस्तानी भाषा में जीवन की वास्तविकताओं से जुड़ी ये रचनाएँ मित्रों के दिल को छूती थीं। उससे प्रेरणा लेकर हमनें निर्णय किया कि हम हिंदी (या अन्य भारतीय भाषाओं के हिंदी में उपलब्ध, जैसे ‘ययाति’) साहित्य की अच्छी रचनाओं में से कुछ चयनित अंश भी प्रकाशित करेंगे। यह प्रकिया बेहद रोचक थी।

मैं और संतीश चन्द्र गुप्त रूममेट थे। हर शुक्रवार की शाम मैं लाइब्रेरी जाता और घंटों व्यतीत करके हिंदी की कुछ किताबें हॉस्टल में लाता था। रात में खाना खाकर मैं उन्हें पढ़ने बैठता। अब यह कहना मैं जरूरी नहीं समझता कि वे रचनाएँ बड़ी रोचक, रसपूर्ण और हमारी जवानी के साहित्यिक समझ के अनुरूप होती थीं। जब मैं रात को 2-3 बजे तक थक जाता तब मैं सतीश को जगाता था और सतीश भाई ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सुबह 8-9 बजे तक जमकर उपन्यास पढ़ते थे और इसके बाद वो मुझे जगाते थे। इस तरह से मेरी साहित्य यात्रा में सतीश चन्द्र गुप्त, अजय लाल सहित कई मित्रों का भरपूर योगदान रहा है।

‘सृजन’ बढ़ता गया, फैलता गया, सराहा जाता रहा और चाहा जाता रहा। पर मेरे तीसरे या चौथे साल में लाइब्रेरी में कुछ नवीकरण का काम शुरू हुआ और कुछ समय के लिए नोटिस बोर्ड हटा लिया गया । मुझे लगा यह एक अस्थायी अवरोध है। पर काम पूरा के बाद जब मैं अंक लेकर नोटिस बोर्ड पर लगाने पहुँचा तो बताया गया कि चूँकि पहले ‘सृजन’ 3-4 पेज तक थी तो ठीक था पर अब 8-10 पेज की होने के कारण नोटिस बोर्ड पर जगह कम बचती है। लिहाजा लाइब्रेरियन ने यह निर्णय लिया कि ‘सृजन’ को लाइब्रेरी के नोटिस बोर्ड पर स्थान नहीं दिया जाएगा। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, लाइब्रेरियन से मिला भी पर शायद आखिरी निर्णय लिया जा चुका था। मैंने अपनी ओर से  प्रतिकार किया पर कोई सुनवाई नहीं हुई। बोला गया कि डायरेक्टर की ओर से यह निर्णय लिया गया है। मैं भी सिविल सर्विसेस की तैयारी में जुटना चाहता था सो मैं भी इस घटना को विधि का विधान मानकर चुप रह गया।

श्री आमोद जी ने जब मुझे ‘सृजन’ की जिम्मेदारी दी तब मैं उसे आगे बढ़ा पाया पर मुझे तो ‘सिस्टम’ ने ही मना कर दिया सो आगे इस परंपरा को बढ़ाने का मेरे पास कोई माध्यम नहीं था। आई.आई.टी. कानपुर में ‘सृजन’ को लाइब्रेरी में नहीं लगाने देने की घटना को मैं सिस्टम की संवेदनहीनता मानता हूँ और मैंने एक आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में हमेशा संवेदनहीनता से दूरी बनाए रखने की कोशिश की है। शायद आई.आई.टी की अनगिनत मीठी यादों के बीच ‘सृजन’ को बंद करा देने की घटना मुझे अभी भी टीस दे जाती है।

लगभग 24 साल बाद सतीश, राकेश, बिरला, गीतिका, आशीष जैसे मित्रों की प्रेरणा से कभी भित्ति-पत्रिका के रूप में निकलने वाली ‘सृजन’ आज अत्याधुनिक ई-फॉर्मेट में पुनः प्रकाशित होने जा रही है। यह समूह सबल है और तैयार है प्रकाशन के लिए भी, लेखन के लिए भी और संपादन के लिए भी। और स्वाभाविक रूप से मेरे लिए यह बहुत ही खुशी का पल है।

ढेरों शुभकामनाएँ मित्रों!

06 अप्रैल

ग्रीष्म-अंक: ‘सृजन’ का नॉस्टाल्जिआपा

‘सृजन’ के इस नए रूप का प्रथम अंक आप सभी को सविनय प्रस्तुत है। इसकी भूमिका लिखने का प्रयास पिछले दिनों में कई बार किया, परन्तु स्वयं को नितांत अक्षम पाया। भावों के कई तंतु हैं, बहुत सोचा कि कैसे उनकी एक डोर बनाकर आपको उसमें लपेट लूँ, कैसे शुरुआत करूँ, लेकिन कुछ भी जँचा नहीं, हर प्रयास में एक अधूरापन सा लगा। फिर स्मरण आया कि मौन भी एक अभिव्यक्ति है, और न कह पाने की यह स्वीकारोक्ति भी एक कथन है। न कह पाना केवल मेरा ही अनुभव नहीं है, आपके साथ भी कभी न कभी हुआ ही होगा। तो उम्मीद है कि आप समझ जाएँगे।

आई. आई. टी. कानपुर में बी. टेक. की पढ़ाई के प्रथम वर्ष में ‘सृजन’ नाम की हिन्दी मासिक भित्ति-पत्रिका से परिचय हुआ। कई छात्रों की तरह मैं भी बारहवीं कक्षा तक हिंदी माध्यम में पढ़ा था; विज्ञान और गणित, सब कुछ हिन्दी में। अभी भी गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान के कई तकनीकी शब्द मेरे दिमाग में पहले हिन्दी में आते है। अब जब मैं वहाँ पुस्तकालय में बिताए अपने सीमित समय को याद करता हूँ, तो पाता हूँ कि वह अधिकांश हिन्दी पुस्तकों की अलमारियों के बीच गुजरा। हिन्दी की जितनी कहानियाँ, उपन्यास, कविताएँ उन चार सालों में पढ़ीं, उतनी न उसके पहले पढ़ीं और न बाद में। पढ़ाई-लिखाई, मस्ती और बदमाशी के बीच पुस्तकालय के सूचना-पट पर लगे ‘सृजन’ के पन्नों को पढ़ना पसंदीदा शगल हो गया। हर महीने इंतज़ार रहता था। आखिर आत्मा मातृभाषा में ही बोलती-समझती है।

दूसरे वर्ष में ‘सृजन’ प्रकाशन की जिम्मेदारी अश्विनी ने ले ली, मैं और कई अन्य मित्र इसमें सहयोगी थे। सहपाठियों से रचनाएँ इकट्ठा करते थे, कागज पर अपने सुन्दर हस्तलेख से लिखते थे, और पुस्तकालय के सूचना पटल पर लगाते थे। कुछ अपरिहार्य कारणों से अंतिम वर्ष में यह पत्रिका बंद हो गयी। हम सभी अपने जीवन के अगले पड़ाव की तैयारी में व्यस्त हो गए। जब आई. आई. टी. से निकले तो हम सब अपनी जिंदगी में डूब गए। पहले अपने काम और आजीविका की सरपट दौड़, और फिर साथ में विवाह और बच्चों की जिम्मेदारियाँ। वक्त की कैद में सभी की जिंदगी है, मगर जो चंद आजाद घड़ियाँ मिलीं बस उनमें ही हिन्दी साहित्य को पढ़ना या लिखना हो पाया।

इस सब के बीच ‘सृजन’ की स्मृति पता नहीं कैसे जीवित रही। ठीक चार हफ्ते पहले हम ‘सृजन’ के चाहने वालों के बीच यह बात चली कि सृजन को फिर से शुरू करना चाहिए। अश्विनी ने कहा कि चैत्र प्रतिपदा पर नव संवत्सर के शुभ अवसर पर ‘सृजन’ का पुनस्र्त्थान हो, प्रथम अंक निकले। समय बहुत कम था, और साथ ही वित्तीय वर्ष का आखिरी मास भी था, लेकिन फिर भी “शुभस्य शीघ्रम्” और “काल करे सो आज कर” के भाव से लग गए। पहला कदम चाहे जितना ही छोटा क्यों न हो, यात्रा का शुभारम्भ उसी से होता है। पिछले चौबीस सालों में बहुत कुछ बदल गया है। इंटरनेट और यूनिकोड ने हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के साहित्य को सुलभ कराया है, और प्रकाशन सरल हुआ है, और तकनीकी ने पाठकों तक पहुँचना सुगम कर दिया है। लेकिन साथ ही, हम सभी को लिखने का उतना अभ्यास नहीं रहा है, और सभी काफी व्यस्त भी हैं। इस सब के बावजूद, प्रस्तावित समय-सीमा में हम आरंभिक अंक निकालने में सफल हुए हैं।

भविष्य में यह पत्रिका किस मुकाम पर पहुँचेगी, वृक्ष कैसा होगा, कौन से फूल-फल लगेंगे, यह हमारा प्रयास निर्धारित करेगा। लेकिन इसका बीज कहाँ से आया, यह इस अंक की विषयवस्तु है। यह अंक अतीत और आगत के बीच की कड़ी है, इसीलिए हमने इसे नॉस्टाल्जिआपा कहा है।

आशा है आपको हमारा प्रयास पसंद आएगा, और आप इसके प्रकाशन और प्रसार में सहयोगी होंगे।

प्रोत्साहन एवं सहभागिता की आशा के साथ,
आपका,
सतीश चन्द्र गुप्त
चैत्र प्रतिपदा, संवत 2076
(6 अप्रैल 2019)

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