01 मई

पानी में पड़े कमल मुरझाने लगे हैं

पानी में पड़े कमल मुरझाने लगे हैं,
ये बादल भी आग बरसाने लगे हैं।

जिन दीवानों से उम्मीदें थी हमको,
वो सत्ता वाले ही हमे सताने लगे हैं।

रूह ही मैली हो चुकी जिन लोगों की,
चोला बदल वो फिर लौट आने लगे हैं।

खोखली हो गयी संसद की बुनियादें,
अब दीवारों में दीमक आने लगे हैं।

क्या हुआ है इन घर-बार वालों को,
कोठियों से सड़कों पर आने लगे हैं।

आज वीरान दिखाई देती है वो बस्ती,
बसाने में जिसको कई ज़माने लगे हैं।

खूब बदला है मंज़र इन हवाओं ने,
ये पत्थर भी अब गीत गाने लगे हैं।

कहीं चुनाव आसपस तो नहीं ‘नफ़्स’,
सफ़ेद पौशाक वाले नज़र आने लगे हैं।

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