01 मई

पानी में पड़े कमल मुरझाने लगे हैं

पानी में पड़े कमल मुरझाने लगे हैं,
ये बादल भी आग बरसाने लगे हैं।

जिन दीवानों से उम्मीदें थी हमको,
वो सत्ता वाले ही हमे सताने लगे हैं।

रूह ही मैली हो चुकी जिन लोगों की,
चोला बदल वो फिर लौट आने लगे हैं।

खोखली हो गयी संसद की बुनियादें,
अब दीवारों में दीमक आने लगे हैं।

क्या हुआ है इन घर-बार वालों को,
कोठियों से सड़कों पर आने लगे हैं।

आज वीरान दिखाई देती है वो बस्ती,
बसाने में जिसको कई ज़माने लगे हैं।

खूब बदला है मंज़र इन हवाओं ने,
ये पत्थर भी अब गीत गाने लगे हैं।

कहीं चुनाव आसपस तो नहीं ‘नफ़्स’,
सफ़ेद पौशाक वाले नज़र आने लगे हैं।

01 मई

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं – दुष्यन्त कुमार

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं

तेरी ज़बान है झूठी जम्हूरियत की तरह
तू इक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं

तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यूँ तो सियासी हैं पर कमीन नहीं

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लाएक़ तो है हसीन नहीं

ज़रा सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कॉलर हो आस्तीन नहीं

दुष्यन्त कुमार