06 अप्रैल

तेलुओं की जय हो

पिछले साल दशहरे की छुट्टियों में मैं गुड़गाँव गई थी। ओला कैब में बैठ कर, बच्चों के साथ, सोहना रोड की तरफ जा रही थी, एक बचपन की सहेली से मिलने। गाड़ी लाल बत्ती पर रुकी हुई थी और मैं अपने ख्यालों में खोई हुई थी कि बगल वाली गाड़ी से एक प्यारी सी आवाज़ सुनाई पड़ी। मेरी कोई हमउम्र अपने बच्चे को प्यार से समझा रही थी, अंग्रेजी में “Darling, I will get you those puzzles tomorrow on my way back from office. Now come on give me a smile.”

मुझे उसका चेहरा दिख नहीं रहा था, लेकिन यकायक मुँह से निकला “मनीषा???” अगले ही क्षण उसने अपना चेहरा मेरी तरफ घुमाया। हाँ, वो मनीषा ही थी। उसने मुझे कुछ क्षणों तक घूरा और इतने में ही ट्रैफिक की बत्ती हरी हो गयी। अब गुडगाँव की सड़कें और उस पर यातायात, किसी दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु से कम थोड़ी है। मेरा ओला वाला गाड़ी आगे बढ़ा चुका था, मैं थोड़ी सी सकुचायी हुई थी, यह सोचकर कि शायद उसने मुझे पहचाना नहीं। पर फिर भी मैं उसकी ही तरफ देख रही थी। उसने भी अपनी हुंडई एक्सेंट कार आगे बढ़ायी और चिल्लायी, “गीतिका!” फिर उसने अपनी कार को थोड़ा आगे ले जाकर, सड़क के बायीं तरफ किनारे पर रोक दिया। हाँ, उसने भी मुझे पहचान लिया था, मैंने ठंडी सांस भरी और अपने ओला वाले से रुकने को कहा। वो थोड़ा अनमनाया, पर फिर रोक कर बोला, “ज़रा जल्दी कीजिये मैडम।” हम दोनों अपनी अपनी गाड़ियों से उतर कर गर्मजोशी के साथ मिले, आखिर २३ साल बाद मिल रहे थे। वो फर्राटे से अंग्रेजी में बात कर रही है। गुड़गाँव में अपनी एक कंपनी चलाती है। कुछ 70-80 लोगों की कंपनी है उसकी और काम भारत के बाहर भी फैला हुआ है। देखने और बात करने के ढंग में सफलता साफ़ झलक रही थी। हमने एक दूसरे के फ़ोन नंबर अदल-बदल कर लिए और जल्दी मिलने का वादा कर हम अपने अपने रास्ते चल दिए।

अब तो मेरे ख्यालों का रंग ही बदल गया था। क्या ये वही मनीषा थी जिसे IIT में अंग्रेजी ज़रा सी भी नहीं आती थी, और तो और परम तेलू समझा जाता था? यहाँ तक कि उसे वहाँ से निकलना पड़ा था कोर्स में उत्तीर्ण न हो पाने की वजह से। चौंक गए? चलिए २४-२५ साल पीछे चलते हैं, और पूरा किस्सा बताती हूँ।

हम कुछ लोग IIT में JEE की परीक्षा उत्तीर्ण करके नही आये थे। हम लोग एक अलग परीक्षा देकर स्नातक की डिग्री लेने के लिए 2 साल के लिए आई. आई. टी. में दाखिल हुए थे। हमें MSc 2yr में दाखिला मिला था, लेकिन हमारी सारी कक्षाएँ BTech या Integrated MSc वालों के साथ ही होती थीं। स्वाभाविक था की वो JEE वाले लोग हमें अलग लगते थे। हालाँकि किसी के भी सिर के पीछे कोई अलग सा तेज हो या किसी के पास उड़ने वाले पर हों, ऐसा तो मैंने नहीं देखा, पर ऐसा हम सोचते थे कि शायद उनका दिमाग ज़्यादा तेज़ चलता होगा। हमारी इस सोच की वजह से क्या हम कक्षा शुरू होने के पहले ही कक्षा के तेलुओं में शामिल हो जाते थे? शायद…

यहाँ से हमारी मनीषा की बात शुरू होती है – उसे अंग्रेजी ज़रा कम आती थी, यों समझिए ना के बराबर। हमारा दाखिला एक प्रवेश परीक्षा के बाद हुआ था और वो परीक्षा अंग्रेजी में ही थी। तो उसने कैसे उस प्रवेश परीक्षा को पार किया, ये पता नहीं। पर सच ये है कि यहाँ सभी शिक्षक अंग्रेजी में ही पढ़ाते हैं। ऐसे में वो किसी भी पाठ को आसानी से समझ नहीं पाती थी। कभी-कभी मैं उसको पाठ हिंदी में समझा देती थी। पर ये काफी मुश्किल था। जब पहली बार क्विज हुईं, तो उसे बहुत कम अंक मिले। धीरे धीरे वो काफी परीक्षाओं में असफ़ल होने लगी। हम कुछ सहपाठियों को उसकी चिंता हुई और हमने उसे थोड़ा और पढ़ाना शुरू किया। लेकिन अपनी खुद की पढ़ाई और बाकी खेल-वेल के बाद हम उसे उतना समय नहीं दे पाते थे, जितने की शायद उसे ज़रुरत थी। वो पहले ही सेमेस्टर में 6 में से 4 विषयों में अनुत्तीर्ण हो गयी। वो ही नहीं, हम सब घबरा गए कि अब क्या होगा, कैसे वो आगे पढ़ेगी। अगले सेमेस्टर में भी ऐसा ही कुछ हुआ, 5 में से शायद 3 या 4 विषयों में वो उत्तीर्ण नहीं हो सकी।

इंस्टिट्यूट की तरफ से उसे चेतावनी मिली की अगर उसने कुछ विषयों में सफलता नहीं दिखाई तो उसे आई आई टी से निकाल दिया जाएगा। हम सब ने काफी कोशिश की उसे पढ़ाने की। और कुछ मिंत्रों ने इंस्टिट्यूट से भी निवेदन किया कि उसे थोड़े मौके और दिए जाएँ, और अंग्रेजी सीखने में मदद भी। इंस्टिट्यूट ने उसे 2-3 बार मौके दिए, लेकिन कुछ नहीं हो पाया। आखिरकार, उसे इंस्टिट्यूट छोड़ना पड़ा।

अब मेरे मन में कुछ सवाल हैं: क्या अंग्रेजी ना जानना ही उसका अपराध था? या फिर उसको सच में विषय ही समझ नहीं आता था? तो फिर उसका दाखिला भी कैसे हुआ? तो क्या इंस्टिट्यूट को अंग्रेजी कि कक्षाएँ भी शुरू कर देनी चाहिए? या बाकी जगहों की तरह ट्यूसन?

अगर हमारी कक्षाएँ JEE वालों के साथ न होकर, केवल MSc 2yr वालों के साथ होती, तो क्या तब भी वो सफल नहीं हो पाती? अगर, हम सभी अपने आप को JEE वालों के सामने पहले से ही तेलू न मानते, तो क्या कुछ फर्क पड़ता? क्या पता? मुझे इस बात की हमेशा ख़ुशी होती थी कि हमें JEE वालों से न तो अलग कक्षाओं में पढ़ाया जाता था और न ही अलग परीक्षाएँ थी। हम सब एक थे।

पर उस पूरे दौर से जो गुज़र रही थी, उसे कैसा लगता था? क्या हम सहपाठियों ने उसका ठीक से साथ दिया था या उसे कभी अकेलापन लगता होगा? IIT से निकाल दिए जाने से क्या उसका जीवन नष्ट हो गया? नहीं!

मुझे ये लिखते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि उसने कभी हताश होने की बात नहीं की, न ही कभी आत्महत्या जैसे तीव्र कदम उठाने की। इंस्टिट्यूट से निकलने के बाद उसने अपना अलग एक काम शुरू किया था। सिर्फ ये ही नहीं, जब भी मिलती वो खुश नज़र आती। IIT से निकलने का दुःख तो था उसे, पर वो टूटी नहीं थी।

और आज की मनीषा को देख कर तो मैं खुश हूँ और बेहद चकित। कौन उसे तेलू कहता है? अगर कहता है तो मै कहूँगी: तलुओं की जय हो!

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